आनन्दं हठमाहरन्निव हरध्यानार्चनादीक्षण-
स्यासत्तावपि भूपतिः प्रियतमाविच्छेदखेदालसः ।
पक्षद्वारदिशं प्रति प्रति मुहुर्द्राङ्गिर्गतप्रेयसी-
प्रत्यासत्तिधिया दिशन्दृशमसौ निर्गन्तुमुत्तस्थिवान् ॥
आनन्दं हठमाहरन्निव हरध्यानार्चनादीक्षण-
स्यासत्तावपि भूपतिः प्रियतमाविच्छेदखेदालसः ।
पक्षद्वारदिशं प्रति प्रति मुहुर्द्राङ्गिर्गतप्रेयसी-
प्रत्यासत्तिधिया दिशन्दृशमसौ निर्गन्तुमुत्तस्थिवान् ॥
स्यासत्तावपि भूपतिः प्रियतमाविच्छेदखेदालसः ।
पक्षद्वारदिशं प्रति प्रति मुहुर्द्राङ्गिर्गतप्रेयसी-
प्रत्यासत्तिधिया दिशन्दृशमसौ निर्गन्तुमुत्तस्थिवान् ॥
अन्वयः
AI
हरध्यानार्चनादीक्षणस्य असत्तायाम् अपि आनन्दम् हठम् आहरन् इव, प्रियतमाविच्छेदखेदालसः असौ भूपतिः द्राक् निर्गतप्रेयसीप्रत्यासत्तिधिया मुहुः पक्षद्वारदिशम् प्रति दृशम् दिशन् निर्गन्तुम् उत्तस्थिवान् ।
Summary
AI
Even in the absence of seeing Shiva's meditation and worship, the king, languid from the sorrow of separation from his beloved, stood up to leave, as if forcibly bringing joy, repeatedly directing his gaze towards the side door with the thought of the imminent return of his departed beloved.
पदच्छेदः
AI
| आनन्दम् | आनन्द (२.१) | joy |
| हठम् | हठ (२.१) | forcibly |
| आहरन् | आहरत् (आ√हृ+शतृ, १.१) | bringing |
| इव | इव | as if |
| हरध्यानार्चनादीक्षणस्य | हर–ध्यान–अर्चना–आदि–ईक्षण (६.१) | of the sight of Shiva's meditation, worship, etc. |
| असत्तायाम् | असत्ता (७.१) | in the absence |
| अपि | अपि | even |
| भूपतिः | भूपति (१.१) | the king |
| प्रियतमाविच्छेदखेदालसः | प्रियतमा–विच्छेद–खेद–आलस (१.१) | languid from the sorrow of separation from his most beloved |
| पक्षद्वारदिशम् | पक्षद्वार–दिश् (२.१) | the direction of the side door |
| प्रति | प्रति | towards |
| मुहुः | मुहुस् | again and again |
| द्राक् | द्राक् | quickly |
| निर्गतप्रेयसीप्रत्यासत्तिधिया | निर्गत (निर्√गम्+क्त)–प्रेयसी–प्रत्यासत्ति–धी (३.१) | with the thought of the imminent return of his departed beloved |
| दिशन् | दिशत् (√दिश्+शतृ, १.१) | directing |
| दृशम् | दृश् (२.१) | his gaze |
| असौ | अदस् (१.१) | he |
| निर्गन्तुम् | निर्गन्तुम् (निर्√गम्+तुमुन्) | to go out |
| उत्तस्थिवान् | उत्तस्थिवत् (उद्√स्था+क्तवतु, १.१) | stood up |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | न | न्दं | ह | ठ | मा | ह | र | न्नि | व | ह | र | ध्या | ना | र्च | ना | दी | क्ष | ण |
| स्या | स | त्ता | व | पि | भू | प | तिः | प्रि | य | त | मा | वि | च्छे | द | खे | दा | ल | सः |
| प | क्ष | द्वा | र | दि | शं | प्र | ति | प्र | ति | मु | हु | र्द्रा | ङ्गि | र्ग | त | प्रे | य | सी |
| प्र | त्या | स | त्ति | धि | या | दि | श | न्दृ | श | म | सौ | नि | र्ग | न्तु | मु | त्त | स्थि | वान् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.