तपति जगत एव मूर्ध्नि भूत्वा
रविरधुना त्वमिवाद्भुतप्रतापः ।
पुरमथनमुपास्य पश्य पुण्यै-
रधरितमेनमनन्तरं त्वदीयैः ॥
तपति जगत एव मूर्ध्नि भूत्वा
रविरधुना त्वमिवाद्भुतप्रतापः ।
पुरमथनमुपास्य पश्य पुण्यै-
रधरितमेनमनन्तरं त्वदीयैः ॥
रविरधुना त्वमिवाद्भुतप्रतापः ।
पुरमथनमुपास्य पश्य पुण्यै-
रधरितमेनमनन्तरं त्वदीयैः ॥
अन्वयः
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अधुना अद्भुतप्रतापः रविः त्वम् इव जगतः मूर्ध्नि भूत्वा एव तपति । अनन्तरम् पुरमथनम् उपास्य त्वदीयैः पुण्यैः अधरितम् एनम् पश्य ।
Summary
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Now the sun, of wondrous majesty, shines like you, being at the head of the world. Afterwards, having worshipped Shiva, see this sun surpassed by your merits.
पदच्छेदः
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| तपति | तपति (√तप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shines |
| जगतः | जगत् (६.१) | of the world |
| एव | एव | indeed |
| मूर्ध्नि | मूर्धन् (७.१) | on the head |
| भूत्वा | भूत्वा (√भू+क्त्वा) | having been |
| रविः | रवि (१.१) | the sun |
| अधुना | अधुना | now |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| इव | इव | like |
| अद्भुतप्रतापः | अद्भुतप्रताप (१.१) | of wondrous majesty |
| पुरमथनम् | पुरमथन (२.१) | the destroyer of cities (Shiva) |
| उपास्य | उपास्य (उप√आस्+ल्यप्) | having worshipped |
| पश्य | पश्य (√दृश् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | see |
| पुण्यैः | पुण्य (३.३) | by the merits |
| अधरितम् | अधरित (अधस्√धृ+णिच्+क्त, २.१) | surpassed |
| एनम् | इदम् (२.१) | this one |
| अनन्तरम् | अनन्तरम् | afterwards |
| त्वदीयैः | त्वदीय (३.३) | by your |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | प | ति | ज | ग | त | ए | व | मू | र्ध्नि | भू | त्वा | |
| र | वि | र | धु | ना | त्व | मि | वा | द्भु | त | प्र | ता | पः |
| पु | र | म | थ | न | मु | पा | स्य | प | श्य | पु | ण्यै | |
| र | ध | रि | त | मे | न | म | न | न्त | रं | त्व | दी | यैः |
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