इति तं स विसृज्य धैर्यवा-
न्नृपतिः सूनृतवाग्बृहस्पतिः ।
अविशद्वनवेश्म विस्मितः
स्मृतिलग्नैः कलहंसशंसितैः ॥
इति तं स विसृज्य धैर्यवा-
न्नृपतिः सूनृतवाग्बृहस्पतिः ।
अविशद्वनवेश्म विस्मितः
स्मृतिलग्नैः कलहंसशंसितैः ॥
न्नृपतिः सूनृतवाग्बृहस्पतिः ।
अविशद्वनवेश्म विस्मितः
स्मृतिलग्नैः कलहंसशंसितैः ॥
अन्वयः
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इति तम् विसृज्य, धैर्यवान् सूनृत-वाक्-बृहस्पतिः सः नृपतिः स्मृति-लग्नैः कलहंस-शंसितैः विस्मितः (सन्) वनवेश्म अविशत् ।
Summary
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"Having thus sent him off, that courageous king, a veritable Brihaspati in pleasant and true speech, entered his forest-abode, astonished by the words of the swan that clung to his memory."
पदच्छेदः
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| इति | इति | thus |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| सः | तद् (१.१) | he |
| विसृज्य | विसृज्य (वि√सृज्+ल्यप्) | having sent off |
| धैर्यवान् | धैर्यवत् (१.१) | the courageous one |
| नृपतिः | नृपति (१.१) | the king |
| सूनृतवाग्बृहस्पतिः | सूनृत–वाच्–बृहस्पति (१.१) | a Brihaspati in pleasant and true speech |
| अविशत् | अविशत् (आ√विश् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | entered |
| वनवेश्म | वनवेश्मन् (२.१) | the forest-abode |
| विस्मितः | विस्मित (वि√स्मि+क्त, १.१) | astonished |
| स्मृतिलग्नैः | स्मृति–लग्न (३.३) | by things clinging to his memory |
| कलहंसशंसितैः | कलहंस–शंसित (३.३) | spoken by the swan |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | तं | स | वि | सृ | ज्य | धै | र्य | वा | |
| न्नृ | प | तिः | सू | नृ | त | वा | ग्बृ | ह | स्प | तिः |
| अ | वि | श | द्व | न | वे | श्म | वि | स्मि | तः | |
| स्मृ | ति | ल | ग्नैः | क | ल | हं | स | शं | सि | तैः |
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