अनुरूपमिमं निरूपय-
न्नथ सर्वेष्वपि पूर्वपक्षताम् ।
युवसु व्यपनेतुमक्षमः
त्वयि सिद्धान्तधियं न्यवेशयम् ॥
अनुरूपमिमं निरूपय-
न्नथ सर्वेष्वपि पूर्वपक्षताम् ।
युवसु व्यपनेतुमक्षमः
त्वयि सिद्धान्तधियं न्यवेशयम् ॥
न्नथ सर्वेष्वपि पूर्वपक्षताम् ।
युवसु व्यपनेतुमक्षमः
त्वयि सिद्धान्तधियं न्यवेशयम् ॥
अन्वयः
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अथ अनुरूपम् इमं निरूपयन्, सर्वेषु युवसु अपि पूर्वपक्षतां व्यपनेतुम् अक्षमः (अहं) त्वयि सिद्धान्त-धियं न्यवेशयम्।
Summary
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Then, while searching for a suitable match for her, and being unable to refute the preliminary claims of all other youths, I established the final conclusion in you, considering you the perfect match.
पदच्छेदः
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| अनुरूपम् | अनुरूप (२.१) | a suitable one |
| इमम् | इदम् (२.१) | this one |
| निरूपयन् | निरूपयत् (निर्√रूप्+णिच्+शतृ, १.१) | searching for |
| अथ | अथ | then |
| सर्वेषु | सर्व (७.३) | in all |
| अपि | अपि | even |
| पूर्वपक्षताम् | पूर्वपक्षता (२.१) | the state of being a preliminary view |
| युवसु | युवन् (७.३) | among the youths |
| व्यपनेतुम् | व्यपनेतुम् (वि+अप√नी+तुमुन्) | to refute |
| अक्षमः | अक्षम (१.१) | unable |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | in you |
| सिद्धान्तधियम् | सिद्धान्त–धी (२.१) | the thought of the final conclusion |
| न्यवेशयम् | न्यवेशयम् (नि√विश् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I placed |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | नु | रू | प | मि | मं | नि | रू | प | य | |
| न्न | थ | स | र्वे | ष्व | पि | पू | र्व | प | क्ष | ताम् |
| यु | व | सु | व्य | प | ने | तु | म | क्ष | मः | |
| त्व | यि | सि | द्धा | न्त | धि | यं | न्य | वे | श | यम् |
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