स गरुद्वनदुर्गदुर्ग्रहा-
न्कटु कीटान्दशतः सतः क्वचित् ।
नुनुदे तनुकण्डु पण्डितः
पटुचञ्चूपुटकोटिकुट्टनैः ॥
स गरुद्वनदुर्गदुर्ग्रहा-
न्कटु कीटान्दशतः सतः क्वचित् ।
नुनुदे तनुकण्डु पण्डितः
पटुचञ्चूपुटकोटिकुट्टनैः ॥
न्कटु कीटान्दशतः सतः क्वचित् ।
नुनुदे तनुकण्डु पण्डितः
पटुचञ्चूपुटकोटिकुट्टनैः ॥
अन्वयः
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पण्डितः सः क्वचित् सतः, गरुद्वनदुर्गदुर्ग्रहान्, कटु दशतः कीटान् पटुचञ्चूपुटकोटिकुट्टनैः तनुकण्डुम् नुनुदे।
Summary
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That skilled bird, with sharp pecks from the tip of its clever beak, drove away the itch on its body caused by biting insects that were hard to grasp, being hidden somewhere in the difficult fortress of its forest of feathers.
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | he |
| गरुद्वनदुर्गदुर्ग्रहान् | गरुत्–वन–दुर्ग–दुर्ग्रह (२.३) | hard to grasp in the difficult fortress of the forest of feathers |
| कटु | कटु | sharply |
| कीटान् | कीट (२.३) | insects |
| दशतः | दशत् (√दंश्+शतृ, २.३) | biting |
| सतः | सत् (√अस्+शतृ, २.३) | being |
| क्वचित् | क्वचित् | somewhere |
| नुनुदे | नुनुदे (√नुद् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | drove away |
| तनुकण्डुम् | तनु–कण्डु (२.१) | the body-itch |
| पण्डितः | पण्डित (१.१) | the skilled one |
| पटुचञ्चूपुटकोटिकुट्टनैः | पटु–चञ्चू–पुट–कोटि–कुट्टन (३.३) | with pecks from the tip of its clever beak |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | ग | रु | द्व | न | दु | र्ग | दु | र्ग्र | हा | |
| न्क | टु | की | टा | न्द | श | तः | स | तः | क्व | चित् |
| नु | नु | दे | त | नु | क | ण्डु | प | ण्डि | तः | |
| प | टु | च | ञ्चू | पु | ट | को | टि | कु | ट्ट | नैः |
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