अथ कनकपतत्रस्तत्र तां राजपुत्रीं
सदसि सदृशभासां विस्फुरन्तीं सखीनाम् ।
उडुपरिषदि मध्यस्थायिशीतांशुलेखा-
नुकरणपटुलक्ष्मीमक्षिलक्षीचकार ॥
अथ कनकपतत्रस्तत्र तां राजपुत्रीं
सदसि सदृशभासां विस्फुरन्तीं सखीनाम् ।
उडुपरिषदि मध्यस्थायिशीतांशुलेखा-
नुकरणपटुलक्ष्मीमक्षिलक्षीचकार ॥
सदसि सदृशभासां विस्फुरन्तीं सखीनाम् ।
उडुपरिषदि मध्यस्थायिशीतांशुलेखा-
नुकरणपटुलक्ष्मीमक्षिलक्षीचकार ॥
अन्वयः
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अथ तत्र कनक-पतत्रः सदसि सदृश-भासाम् सखीनाम् (मध्ये) विस्फुरन्तीम्, उडु-परिषदि मध्य-स्थायि-शीतांशु-लेखा-अनुकरण-पटु-लक्ष्मीम् ताम् राज-पुत्रीम् अक्षि-लक्षी-चकार ।
Summary
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Then, the golden-winged swan saw the princess there. She was shining amidst her companions of similar radiance, her beauty skillfully imitating the crescent moon situated in the middle of an assembly of stars.
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | Then |
| कनकपतत्रः | कनक–पतत्र (१.१) | the golden-winged one (swan) |
| तत्र | तत्र | there |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
| राजपुत्रीं | राजन्–पुत्री (२.१) | the princess |
| सदसि | सदस् (७.१) | in the assembly |
| सदृशभासां | सदृश–भास् (६.३) | of those with similar radiance |
| विस्फुरन्तीं | विस्फुरन्त् (वि√स्फुर्+शतृ, २.१) | shining |
| सखीनाम् | सखी (६.३) | of friends |
| उडुपरिषदि | उडु–परिषद् (७.१) | in the assembly of stars |
| मध्यस्थायिशीतांशुलेखानुकरणपटुलक्ष्मीम् | मध्य–स्थायिन्–शीतांशु–लेखा–अनुकरण–पटु–लक्ष्मी (२.१) | whose beauty was skilled in imitating the crescent moon situated in the middle |
| अक्षिलक्षीचकार | अक्षिलक्षी–चकार (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made the target of his eyes (saw) |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | क | न | क | प | त | त्र | स्त | त्र | तां | रा | ज | पु | त्रीं |
| स | द | सि | स | दृ | श | भा | सां | वि | स्फु | र | न्तीं | स | खी | नाम् |
| उ | डु | प | रि | ष | दि | म | ध्य | स्था | यि | शी | तां | शु | ले | खा |
| नु | क | र | ण | प | टु | ल | क्ष्मी | म | क्षि | ल | क्षी | च | का | र |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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