वैदर्भीकेलिशैले मरकतशिखरादुत्थितैरंशुदर्भै-
र्ब्रह्माण्डाघातभग्नस्यदजमदतया ह्रीधृतावाङ्मुखत्वैः ।
कस्या नोत्तानगाया दिवि सुरसुरभेरास्यदेशं गताग्रै-
र्यद्गोग्रासप्रदानव्रतसुकृतमविश्रान्तमुज्जृम्भते स्म ॥
वैदर्भीकेलिशैले मरकतशिखरादुत्थितैरंशुदर्भै-
र्ब्रह्माण्डाघातभग्नस्यदजमदतया ह्रीधृतावाङ्मुखत्वैः ।
कस्या नोत्तानगाया दिवि सुरसुरभेरास्यदेशं गताग्रै-
र्यद्गोग्रासप्रदानव्रतसुकृतमविश्रान्तमुज्जृम्भते स्म ॥
र्ब्रह्माण्डाघातभग्नस्यदजमदतया ह्रीधृतावाङ्मुखत्वैः ।
कस्या नोत्तानगाया दिवि सुरसुरभेरास्यदेशं गताग्रै-
र्यद्गोग्रासप्रदानव्रतसुकृतमविश्रान्तमुज्जृम्भते स्म ॥
अन्वयः
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वैदर्भी-केलि-शैले मरकत-शिखरात् उत्थितैः, ब्रह्माण्ड-आघात-भग्न-स्यद-अज-मदतया ह्री-धृत-अवाक्-मुखत्वैः, दिवि उत्तान-गायाः सुर-सुरभेः आस्य-देशम् गत-अग्रैः अंशु-दर्भैः कस्याः यत्-गो-ग्रास-प्रदान-व्रत-सुकृतम् अविश्रान्तम् न उज्जृम्भते स्म?
Summary
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On Damayanti's pleasure-mountain, whose merit from the vow of feeding cows was not ceaselessly manifested? It was shown by the ray-like blades of grass rising from emerald peaks, their tips reaching the mouth of the celestial cow Kamadhenu in the sky, their heads bent in shame as if their pride was broken by the blow of the universe-egg.
पदच्छेदः
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| वैदर्भीकेलिशैले | वैदर्भी–केलि–शैल (७.१) | on the pleasure-mountain of the princess of Vidarbha |
| मरकतशिखरात् | मरकत–शिखर (५.१) | from the emerald peak |
| उत्थितैः | उत्थित (उद्√स्था+क्त, ३.३) | risen |
| अंशुदर्भैः | अंशु–दर्भ (३.३) | by the ray-like blades of grass |
| ब्रह्माण्डाघातभग्नस्यदजमदतया | ब्रह्माण्ड–आघात–भग्न (√भञ्ज्+क्त)–स्यद–अज–मदता (३.१) | due to the state of pride of the creator Brahma being broken by the blow of the universe-egg |
| ह्रीधृतावाङ्मुखत्वैः | ह्री–धृत (√धृ+क्त)–अवाङ्मुखत्व (३.३) | by those whose faces were held down by shame |
| कस्याः | किम् (६.१) | whose |
| न | न | not |
| उत्तानगायाः | उत्तान–गा (६.१) | of the one lying on her back |
| दिवि | दिव् (७.१) | in the sky |
| सुरसुरभेः | सुर–सुरभि (६.१) | of the celestial cow (Kamadhenu) |
| आस्यदेशं | आस्य–देश (२.१) | the region of the mouth |
| गताग्रैः | गत (√गम्+क्त)–अग्र (३.३) | by those whose tips had reached |
| यद्गोग्रासप्रदानव्रतसुकृतम् | यद्–गो–ग्रास–प्रदान–व्रत–सुकृत (१.१) | the merit from the vow of offering mouthfuls of grass to cows |
| अविश्रान्तम् | अविश्रान्तम् | ceaselessly |
| उज्जृम्भते स्म | उज्जृम्भते स्म (उद्√जृम्भ् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was manifested |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वै | द | र्भी | के | लि | शै | ले | म | र | क | त | शि | ख | रा | दु | त्थि | तै | रं | शु | द | र्भै |
| र्ब्र | ह्मा | ण्डा | घा | त | भ | ग्न | स्य | द | ज | म | द | त | या | ह्री | धृ | ता | वा | ङ्मु | ख | त्वैः |
| क | स्या | नो | त्ता | न | गा | या | दि | वि | सु | र | सु | र | भे | रा | स्य | दे | शं | ग | ता | ग्रै |
| र्य | द्गो | ग्रा | स | प्र | दा | न | व्र | त | सु | कृ | त | म | वि | श्रा | न्त | मु | ज्जृ | म्भ | ते | स्म |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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