अश्रान्तश्रुतिपाठपूतरसनाविर्भूतभूरिस्तवा-
जिह्मब्रह्ममुखौघविघ्नितनवस्वर्गक्रियाकेलिना ।
पूर्वं गाधिसुतेन सामिघटिता मुक्ता नु मन्दाकिनी
यत्प्रासाददुकूलवल्लिरनिलान्दोलैरखेलद्दिवि ॥
अश्रान्तश्रुतिपाठपूतरसनाविर्भूतभूरिस्तवा-
जिह्मब्रह्ममुखौघविघ्नितनवस्वर्गक्रियाकेलिना ।
पूर्वं गाधिसुतेन सामिघटिता मुक्ता नु मन्दाकिनी
यत्प्रासाददुकूलवल्लिरनिलान्दोलैरखेलद्दिवि ॥
जिह्मब्रह्ममुखौघविघ्नितनवस्वर्गक्रियाकेलिना ।
पूर्वं गाधिसुतेन सामिघटिता मुक्ता नु मन्दाकिनी
यत्प्रासाददुकूलवल्लिरनिलान्दोलैरखेलद्दिवि ॥
अन्वयः
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यत्-प्रासाद-दुकूल-वल्लिः अनिल-आन्दोलैः दिवि अखेलत्, (तेन इदम् अनुमीयते यत्) अश्रान्त-श्रुति-पाठ-पूत-रसना-आविर्भूत-भूरि-स्तव-अजिह्म-ब्रह्म-मुख-ओघ-विघ्नित-नव-स्वर्ग-क्रिया-केलिना गाधि-सुतेन पूर्वम् सामि-घटिता मन्दाकिनी नु मुक्ता ।
Summary
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The silk banner of that city's palace played in the sky, swayed by winds, as if it were the river Mandakini, which had been only half-contained and then released by Vishvamitra, whose sport of creating a new heaven was hindered by the flood of praises from the mouths of honest Brahmas, their tongues purified by ceaseless Vedic recitation.
पदच्छेदः
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| अश्रान्तश्रुतिपाठपूतरसनाविर्भूतभूरिस्तवाजिह्मब्रह्ममुखौघविघ्नितनवस्वर्गक्रियाकेलिना | अश्रान्त–श्रुति–पाठ–पूत–रसना–आविर्भूत–भूरि–स्तव–अजिह्म–ब्रह्मन्–मुख–ओघ–विघ्नित–नव–स्वर्ग–क्रिया–केलिन् (३.१) | by one whose sport of creating a new heaven was hindered by the flood of praises from the mouths of honest Brahmas whose tongues were purified by ceaseless recitation of the Vedas |
| पूर्वम् | पूर्वम् | previously |
| गाधिसुतेन | गाधि–सुत (३.१) | by the son of Gadhi (Vishvamitra) |
| सामिघटिता | सामि–घटित (√घट्+क्त, १.१) | half-contained |
| मुक्ता | मुक्त (√मुच्+क्त, १.१) | released |
| नु | नु | indeed / perhaps |
| मन्दाकिनी | मन्दाकिनी (१.१) | the Mandakini river (Ganges) |
| यत्प्रासाददुकूलवल्लिः | यद्–प्रासाद–दुकूल–वल्लि (१.१) | the silk-banner-creeper of whose palace |
| अनिलान्दोलैः | अनिल–आन्दोल (३.३) | by the swayings of the wind |
| अखेलत् | अखेलत् (√खेल् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | played |
| दिवि | दिव् (७.१) | in the sky |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | श्रा | न्त | श्रु | ति | पा | ठ | पू | त | र | स | ना | वि | र्भू | त | भू | रि | स्त | वा |
| जि | ह्म | ब्र | ह्म | मु | खौ | घ | वि | घ्नि | त | न | व | स्व | र्ग | क्रि | या | के | लि | ना |
| पू | र्वं | गा | धि | सु | ते | न | सा | मि | घ | टि | ता | मु | क्ता | नु | म | न्दा | कि | नी |
| य | त्प्रा | सा | द | दु | कू | ल | व | ल्लि | र | नि | ला | न्दो | लै | र | खे | ल | द्दि | वि |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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