श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
एकामत्यजतो नवार्थघटनामेकान्नविंशो महा-
काव्ये तस्य कृतौ नलीयचरिते सर्गोऽयमस्मिन्नगात् ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
एकामत्यजतो नवार्थघटनामेकान्नविंशो महा-
काव्ये तस्य कृतौ नलीयचरिते सर्गोऽयमस्मिन्नगात् ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
एकामत्यजतो नवार्थघटनामेकान्नविंशो महा-
काव्ये तस्य कृतौ नलीयचरिते सर्गोऽयमस्मिन्नगात् ॥
अन्वयः
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कवि-राज-राजि-मुकुट-अलंकार-हीरः श्रीहीरः मामल्लदेवी च जित-इन्द्रिय-चयम् यम् श्रीहर्षम् सुतम् सुषुवे, तस्य कृतौ नलीय-चरिते महाकाव्ये एकाम् नव-अर्थ-घटनाम् अत्यजतः अस्मिन् अयम् एकान्नविंशः सर्गः अगात् ।
Summary
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Srihira, a diamond ornamenting the crowns of the lineage of kingly poets, and Mamalladevi gave birth to a son, Sriharsha, who had conquered his senses. In this epic poem, the Naishadhiyacharitam, his creation, which never abandons the composition of new meanings, this nineteenth canto has come to a close.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षम् | श्रीहर्ष (२.१) | Sriharsha |
| कवि | कवि | poet |
| राज | राज | king |
| राजि | राजि | lineage |
| मुकुट | मुकुट | crown |
| अलंकार | अलंकार | ornament |
| हीरः | हीर (१.१) | a diamond |
| सुतम् | सुत (२.१) | son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Srihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√सू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
| जित | जित (√जि+क्त) | conquered |
| इन्द्रिय | इन्द्रिय | senses |
| चयम् | चय (२.१) | whose group |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| एकाम् | एका (२.१) | one |
| अत्यजतः | अत्यजत् (अ√त्यज्+शतृ, ६.१) | of the one not abandoning |
| नव | नव | new |
| अर्थ | अर्थ | meaning |
| घटनाम् | घटना (२.१) | composition |
| एकान्नविंशः | एकान्नविंश (१.१) | the nineteenth |
| महाकाव्ये | महाकाव्य (७.१) | in the epic poem |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| कृतौ | कृति (७.१) | in the creation |
| नलीय-चरिते | नलीयचरित (७.१) | named Naishadhiyacharitam |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| अस्मिन् | इदम् (७.१) | in this |
| अगात् | अगात् (√इ कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | has gone (ended) |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| ए | का | म | त्य | ज | तो | न | वा | र्थ | घ | ट | ना | मे | का | न्न | विं | शो | म | हा |
| का | व्ये | त | स्य | कृ | तौ | न | ली | य | च | रि | ते | स | र्गो | ऽय | म | स्मि | न्न | गात् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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