प्रातर्वर्णनयानया निजवपुर्भूषाप्रसादानदा-
द्देवी वः परितोषितेति निहितामान्तःपुरीभिः पुरः ।
सूता मण्डनमण्डलीं परिदधुर्माणिक्यरोचिर्मय-
क्रोधावेगसरागलोचनरुचा दारिद्र्यविद्राविणीम् ॥
प्रातर्वर्णनयानया निजवपुर्भूषाप्रसादानदा-
द्देवी वः परितोषितेति निहितामान्तःपुरीभिः पुरः ।
सूता मण्डनमण्डलीं परिदधुर्माणिक्यरोचिर्मय-
क्रोधावेगसरागलोचनरुचा दारिद्र्यविद्राविणीम् ॥
द्देवी वः परितोषितेति निहितामान्तःपुरीभिः पुरः ।
सूता मण्डनमण्डलीं परिदधुर्माणिक्यरोचिर्मय-
क्रोधावेगसरागलोचनरुचा दारिद्र्यविद्राविणीम् ॥
अन्वयः
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"अनया प्रातः-वर्णनया परितोषिता देवी वः निज-वपुः-भूषा-प्रसादान् अदात्" इति अन्तःपुरीभिः पुरः निहिताम्, माणिक्य-रोचिः-मय-क्रोध-आवेग-सराग-लोचन-रुचा दारिद्र्य-विद्राविणीम् मण्डन-मण्डलीम् सूताः परिदधुः ।
Summary
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The bards put on the collection of ornaments placed before them by the harem ladies, who said, "Pleased by this morning description, the queen has given you these gifts of her own body ornaments." These ornaments, which dispelled poverty, shone with the splendor of eyes reddened by a fit of anger, resembling the luster of rubies.
पदच्छेदः
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| प्रातः | प्रातर् | morning |
| वर्णनया | वर्णन (३.१) | by the description |
| अनया | इदम् (३.१) | by this |
| निज | निज | own |
| वपुः | वपुस् | body |
| भूषा | भूषा | ornament |
| प्रसादान् | प्रसाद (२.३) | gifts |
| अदात् | अदात् (√दा कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | gave |
| देवी | देवी (१.१) | the queen |
| वः | युष्मद् (४.३) | to you |
| परितोषिता | परितोषिता (परि√तुष्+णिच्+क्त, १.१) | pleased |
| इति | इति | thus |
| निहिताम् | निहिता (नि√धा+क्त, २.१) | placed |
| अन्तःपुरीभिः | अन्तःपुरी (३.३) | by the harem ladies |
| पुरः | पुरस् | in front |
| सूताः | सूत (१.३) | the bards |
| मण्डन | मण्डन | of ornament |
| मण्डलीम् | मण्डली (२.१) | the collection |
| परिदधुः | परिदधुः (परि√धा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | put on |
| माणिक्य | माणिक्य | ruby |
| रोचिः | रोचिस् | luster |
| मय | मय | made of |
| क्रोध | क्रोध | anger |
| आवेग | आवेग | agitation |
| सराग | सराग | reddened |
| लोचन | लोचन | eye |
| रुचा | रुच् (३.१) | with the splendor of |
| दारिद्र्य | दारिद्र्य | poverty |
| विद्राविणीम् | विद्राविणी (वि√द्रु+णिनि, २.१) | which drives away |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रा | त | र्व | र्ण | न | या | न | या | नि | ज | व | पु | र्भू | षा | प्र | सा | दा | न | दा |
| द्दे | वी | वः | प | रि | तो | षि | ते | ति | नि | हि | ता | मा | न्तः | पु | री | भिः | पु | रः |
| सू | ता | म | ण्ड | न | म | ण्ड | लीं | प | रि | द | धु | र्मा | णि | क्य | रो | चि | र्म | य |
| क्रो | धा | वे | ग | स | रा | ग | लो | च | न | रु | चा | दा | रि | द्र्य | वि | द्रा | वि | णीम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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