यत्पाथोजविमुद्रणप्रकरणे निर्निद्रयत्यंशुमा-
न्दृष्टीः पूर्णयति स्म यज्जलरुहामक्ष्णा सहस्रं हरिः ।
साजात्यं सरसीरुहामपि दृशामप्यस्ति तद्वास्तवं
यन्मूलाद्रियतेतरां कविनृभिः पद्मोपमा चक्षुषः ॥
यत्पाथोजविमुद्रणप्रकरणे निर्निद्रयत्यंशुमा-
न्दृष्टीः पूर्णयति स्म यज्जलरुहामक्ष्णा सहस्रं हरिः ।
साजात्यं सरसीरुहामपि दृशामप्यस्ति तद्वास्तवं
यन्मूलाद्रियतेतरां कविनृभिः पद्मोपमा चक्षुषः ॥
न्दृष्टीः पूर्णयति स्म यज्जलरुहामक्ष्णा सहस्रं हरिः ।
साजात्यं सरसीरुहामपि दृशामप्यस्ति तद्वास्तवं
यन्मूलाद्रियतेतरां कविनृभिः पद्मोपमा चक्षुषः ॥
अन्वयः
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यत् अंशुमान् पाथोज-विमुद्रण-प्रकरणे दृष्टीः निर्निद्रयति, यत् हरिः जल-रुहाम् अक्ष्णाम् सहस्रम् पूर्णयति स्म, तत् सरसीरुहाम् अपि दृशाम् अपि वास्तवम् साजात्यम् अस्ति । यत्-मूलात् चक्षुषः पद्म-उपमा कवि-नृभिः आद्रियतेतराम् ।
Summary
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Because the sun opens the eyes while it opens the lotuses, and because Hari (Indra) once gratified the 'thousand eyes' of the lotuses, there is a real kinship between lotuses and eyes. It is for this reason that the simile of the lotus for the eye is so highly esteemed by poets.
पदच्छेदः
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| यत् | यद् | because |
| पाथोजविमुद्रणप्रकरणे | पाथोज–विमुद्रण–प्रकरण (७.१) | in the matter of unsealing the lotuses |
| निर्निद्रयति | निर्निद्रयति (निर्√द्रा +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | makes sleepless, opens |
| अंशुमान् | अंशुमत् (१.१) | the sun |
| दृष्टीः | दृष्टि (२.३) | eyes |
| पूर्णयति | पूर्णयति (√पूर् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | fills |
| स्म | स्म | did |
| यत् | यद् | because |
| जलरुहाम् | जलरुह (६.३) | of the lotuses |
| अक्ष्णाम् | अक्षि (६.३) | of the eyes |
| सहस्रं | सहस्र (२.१) | a thousand |
| हरिः | हरि (१.१) | Hari (Indra) |
| साजात्यं | साजात्य (१.१) | kinship |
| सरसीरुहामपि | सरसीरुह–अपि (६.३) | of lotuses also |
| दृशामपि | दृश्–अपि (६.३) | of eyes also |
| अस्ति | अस्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is |
| तद्वास्तवं | तद्–वास्तव (१.१) | that is real |
| यन्मूलात् | यद्–मूल (५.१) | from which reason |
| आद्रियतेतरां | आद्रियतेतराम् (आ√दृ +णिच्+तरप् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is highly respected |
| कविनृभिः | कवि–नृ (३.३) | by poets |
| पद्मोपमा | पद्म–उपमा (१.१) | the simile of a lotus |
| चक्षुषः | चक्षुस् (६.१) | for the eye |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | त्पा | थो | ज | वि | मु | द्र | ण | प्र | क | र | णे | नि | र्नि | द्र | य | त्यं | शु | मा |
| न्दृ | ष्टीः | पू | र्ण | य | ति | स्म | य | ज्ज | ल | रु | हा | म | क्ष्णा | स | ह | स्रं | ह | रिः |
| सा | जा | त्यं | स | र | सी | रु | हा | म | पि | दृ | शा | म | प्य | स्ति | त | द्वा | स्त | वं |
| य | न्मू | ला | द्रि | य | ते | त | रां | क | वि | नृ | भिः | प | द्मो | प | मा | च | क्षु | षः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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