ताराशङ्खविलोपकस्य जलजं तीक्ष्णत्विषो भिन्दतः
सारम्भं चलता करेण निबिडां निष्पीडनां लम्भितः ।
छेदार्थापहृताम्बुकम्बुजरजोजम्बालपाण्डूभव-
च्छङ्खच्छित्करपत्त्रतामिह वहन्नस्तंगतार्धो विधुः ॥
ताराशङ्खविलोपकस्य जलजं तीक्ष्णत्विषो भिन्दतः
सारम्भं चलता करेण निबिडां निष्पीडनां लम्भितः ।
छेदार्थापहृताम्बुकम्बुजरजोजम्बालपाण्डूभव-
च्छङ्खच्छित्करपत्त्रतामिह वहन्नस्तंगतार्धो विधुः ॥
सारम्भं चलता करेण निबिडां निष्पीडनां लम्भितः ।
छेदार्थापहृताम्बुकम्बुजरजोजम्बालपाण्डूभव-
च्छङ्खच्छित्करपत्त्रतामिह वहन्नस्तंगतार्धो विधुः ॥
अन्वयः
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तारा-शङ्ख-विलोपकस्य, जलजम् भिन्दतः तीक्ष्ण-त्विषः (सूर्यस्य) स-आरम्भम् चलता करेण निबिडाम् निष्पीडनाम् लम्भितः, विधुः इह छेद-अर्थ-अपहृत-अम्बु-कम्बु-ज-रजः-जम्बाल-पाण्डू-भवत्-शङ्ख-च्छित्-कर-पत्त्रताम् वहन् अस्तम्-गत-अर्धः (अस्ति) ।
Summary
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The moon, half-set, is being intensely squeezed by the moving ray of the sharp-rayed sun, who destroys the star-conches and opens the lotuses. The moon now bears the appearance of a conch-cutter's saw, which has become pale from the mud of lotus pollen and water removed during the cutting process.
पदच्छेदः
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| ताराशङ्खविलोपकस्य | तारा–शङ्ख–विलोपक (६.१) | of the destroyer of the star-conches |
| जलजं | जलज (२.१) | the lotus |
| तीक्ष्णत्विषः | तीक्ष्ण–त्विष् (६.१) | of the one with sharp rays (the sun) |
| भिन्दतः | भिन्दत् (√भिद्+शतृ, ६.१) | of the one who is opening |
| सारम्भं | सारम्भम् | violently |
| चलता | चलत् (√चल्+शतृ, ३.१) | by the moving |
| करेण | कर (३.१) | by the ray |
| निबिडां | निबिड (२.१) | intense |
| निष्पीडनां | निष्पीडना (२.१) | squeezing |
| लम्भितः | लम्भित (√लभ्+णिच्+क्त, १.१) | made to obtain |
| छेदार्थापहृताम्बुकम्बुजरजोजम्बालपाण्डूभवच्छङ्खच्छित्करपत्त्रताम् | छेद–अर्थ–अपहृत–अम्बु–कम्बुज–रजस्–जम्बाल–पाण्डूभवत्–शङ्ख–छिद्–करपत्त्रता (२.१) | the state of being a saw for cutting conches, which is becoming pale with the mud of lotus-pollen and water removed for cutting |
| इह | इह | here |
| वहन् | वहन् (√वह्+शतृ, १.१) | bearing |
| अस्तंगतार्धः | अस्तंगत–अर्ध (१.१) | whose half has set |
| विधुः | विधु (१.१) | the moon |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | रा | श | ङ्ख | वि | लो | प | क | स्य | ज | ल | जं | ती | क्ष्ण | त्वि | षो | भि | न्द | तः |
| सा | र | म्भं | च | ल | ता | क | रे | ण | नि | बि | डां | नि | ष्पी | ड | नां | ल | म्भि | तः |
| छे | दा | र्था | प | हृ | ता | म्बु | क | म्बु | ज | र | जो | ज | म्बा | ल | पा | ण्डू | भ | व |
| च्छ | ङ्ख | च्छि | त्क | र | प | त्त्र | ता | मि | ह | व | ह | न्न | स्तं | ग | ता | र्धो | वि | धुः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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