नय नयनयोर्द्राक्पेयत्वं प्रविष्टवतीरमू-
र्भवनवलभीजालान्नाला इवार्ककराङ्गुलीः ।
भ्रमदणुगणक्रान्ता भान्ति भ्रमन्त्य इवाशु याः
पुनरपि धृता कुन्दे किंवा न वर्धकिना दिवः ॥
नय नयनयोर्द्राक्पेयत्वं प्रविष्टवतीरमू-
र्भवनवलभीजालान्नाला इवार्ककराङ्गुलीः ।
भ्रमदणुगणक्रान्ता भान्ति भ्रमन्त्य इवाशु याः
पुनरपि धृता कुन्दे किंवा न वर्धकिना दिवः ॥
र्भवनवलभीजालान्नाला इवार्ककराङ्गुलीः ।
भ्रमदणुगणक्रान्ता भान्ति भ्रमन्त्य इवाशु याः
पुनरपि धृता कुन्दे किंवा न वर्धकिना दिवः ॥
अन्वयः
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भवन-वलभी-जालात् प्रविष्टवतीः, नालाः इव (स्थिताः) अमूः अर्क-कर-अङ्गुलीः द्राक् नयनयोः पेयत्वम् नय । याः भ्रमत्-अणु-गण-क्रान्ताः (सत्यः) आशु भ्रमन्त्यः इव भान्ति । किम् वा दिवः वर्धकिना कुन्दे पुनः अपि न धृताः?
Summary
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Quickly bring to your eyes for drinking these finger-like sunrays, which have entered through the lattice of the house-turret like stalks. Pervaded by swirling dust particles, they shine as if rapidly revolving. Have they not been placed again on a lathe by the carpenter of heaven?
पदच्छेदः
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| नय | नय (√नी कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | bring |
| नयनयोः | नयन (६.२) | of the two eyes |
| द्राक् | द्राक् | quickly |
| पेयत्वम् | पेयत्व (२.१) | the state of being drinkable |
| प्रविष्टवतीः | प्रविष्टवत् (प्र√विश्+क्तवतु, २.३) | which have entered |
| अमूः | अदस् (२.३) | those |
| भवनवलभीजालात् | भवन–वलभी–जाल (५.१) | from the lattice of the house's turret |
| नालाः | नाला (१.३) | stalks |
| इव | इव | like |
| अर्ककराङ्गुलीः | अर्क–कर–अङ्गुली (२.३) | the fingers of the sun's rays |
| भ्रमदणुगणक्रान्ताः | भ्रमत् (√भ्रम्+शतृ)–अणु–गण–आक्रान्त (१.३) | pervaded by groups of moving dust particles |
| भान्ति | भान्ति (√भा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | shine |
| भ्रमन्त्यः | भ्रमन्ती (√भ्रम्+शतृ, १.३) | revolving |
| इव | इव | as if |
| आशु | आशु | quickly |
| याः | यद् (१.३) | which |
| पुनरपि | पुनर्–अपि | again |
| धृताः | धृता (√धृ+क्त, १.३) | held |
| कुन्दे | कुन्द (७.१) | on a lathe |
| किंवा | किम्–वा | or what? |
| न | न | not |
| वर्धकिना | वर्धकिन् (३.१) | by the carpenter |
| दिवः | दिव् (६.१) | of heaven |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | य | न | य | न | यो | र्द्रा | क्पे | य | त्वं | प्र | वि | ष्ट | व | ती | र | मू |
| र्भ | व | न | व | ल | भी | जा | ला | न्ना | ला | इ | वा | र्क | क | रा | ङ्गु | लीः |
| भ्र | म | द | णु | ग | ण | क्रा | न्ता | भा | न्ति | भ्र | म | न्त्य | इ | वा | शु | याः |
| पु | न | र | पि | धृ | ता | कु | न्दे | किं | वा | न | व | र्ध | कि | ना | दि | वः |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
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