शिशिरजरुजां घर्मं शर्मोदयाय तनूभृता-
मथ खरकरश्यानास्यानां प्रयच्छति यः पयः ।
जलभयजुषां तापं तापस्पृशां हिममित्ययं
परहितमिलत्कृत्यावृत्तिः स भानुरुदञ्चति ॥
शिशिरजरुजां घर्मं शर्मोदयाय तनूभृता-
मथ खरकरश्यानास्यानां प्रयच्छति यः पयः ।
जलभयजुषां तापं तापस्पृशां हिममित्ययं
परहितमिलत्कृत्यावृत्तिः स भानुरुदञ्चति ॥
मथ खरकरश्यानास्यानां प्रयच्छति यः पयः ।
जलभयजुषां तापं तापस्पृशां हिममित्ययं
परहितमिलत्कृत्यावृत्तिः स भानुरुदञ्चति ॥
अन्वयः
AI
यः तनूभृताम् शर्म-उदयाय शिशिर-ज-रुजाम् घर्मम्, अथ खर-कर-श्यान-आस्यानाम् पयः, जल-भय-जुषाम् तापम्, ताप-स्पृशाम् हिमम् (च) प्रयच्छति, इति पर-हित-मिलत्-कृत्य-आवृत्तिः अयम् सः भानुः उदञ्चति ।
Summary
AI
That Sun is rising, whose actions are always for the welfare of others. For the happiness of living beings, he gives heat to those suffering from cold, water (rain) to those whose faces are withered by his harsh rays, heat to those suffering from hydrophobia, and cold to those afflicted by heat.
पदच्छेदः
AI
| शिशिरजरुजाम् | शिशिर–ज–रुज् (६.३) | of those with diseases born of cold |
| घर्मम् | घर्म (२.१) | heat |
| शर्मोदयाय | शर्मन्–उदय (४.१) | for the rise of happiness |
| तनूभृताम् | तनूभृत् (६.३) | of living beings |
| अथ | अथ | and |
| खरकरश्यानास्यानाम् | खर–कर–श्यान–आस्य (६.३) | of those whose faces are withered by harsh rays |
| प्रयच्छति | प्रयच्छति (प्र√दा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | gives |
| यः | यद् (१.१) | who |
| पयः | पयस् (२.१) | water |
| जलभयजुषाम् | जल–भय–जुष् (६.३) | of those who have a fear of water |
| तापम् | ताप (२.१) | heat |
| तापस्पृशाम् | ताप–स्पृश् (६.३) | of those afflicted by heat |
| हिमम् | हिम (२.१) | cold |
| इति | इति | thus |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| परहितमिलत्कृत्यावृत्तिः | पर–हित–मिलत् (√मिल्+शतृ)–कृत्य–आवृत्ति (१.१) | whose actions and behaviour are joined with the welfare of others |
| सः | तद् (१.१) | that |
| भानुः | भानु (१.१) | the sun |
| उदञ्चति | उदञ्चति (उद्√अञ्च् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | rises |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शि | शि | र | ज | रु | जां | घ | र्मं | श | र्मो | द | या | य | त | नू | भृ | ता |
| म | थ | ख | र | क | र | श्या | ना | स्या | नां | प्र | य | च्छ | ति | यः | प | यः |
| ज | ल | भ | य | जु | षां | ता | पं | ता | प | स्पृ | शां | हि | म | मि | त्य | यं |
| प | र | हि | त | मि | ल | त्कृ | त्या | वृ | त्तिः | स | भा | नु | रु | द | ञ्च | ति |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.