रुचिरचरणः सूतोरुश्रीसनाथरथः शनिं
शमनमपि स त्रातुं लोकानसूत सुताविति ।
रथपदकृपासिन्धुर्बन्धुर्दृशामपि दुर्जनै-
र्यदुपहसितो भास्वान्नास्मान्हसिष्यति कः खलः ॥
रुचिरचरणः सूतोरुश्रीसनाथरथः शनिं
शमनमपि स त्रातुं लोकानसूत सुताविति ।
रथपदकृपासिन्धुर्बन्धुर्दृशामपि दुर्जनै-
र्यदुपहसितो भास्वान्नास्मान्हसिष्यति कः खलः ॥
शमनमपि स त्रातुं लोकानसूत सुताविति ।
रथपदकृपासिन्धुर्बन्धुर्दृशामपि दुर्जनै-
र्यदुपहसितो भास्वान्नास्मान्हसिष्यति कः खलः ॥
अन्वयः
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सः रुचिर-चरणः सूत-उरु-श्री-सनाथ-रथः (भास्वान्) लोकान् त्रातुम् शनिम् शमनम् अपि इति सुतौ असूत । यत् रथ-पद-कृपा-सिन्धुः दृशाम् बन्धुः अपि भास्वान् दुर्जनैः उपहसितः, (तर्हि) कः खलः अस्मान् न हसिष्यति?
Summary
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He, the Sun, with beautiful rays and a chariot graced by his great charioteer Aruna, produced two sons, Shani and Yama, to protect the worlds. Since even the Sun—an ocean of mercy for the Chakravaka birds and a friend to the eyes—is ridiculed by the wicked, what wicked person will not laugh at us?
पदच्छेदः
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| रुचिरचरणः | रुचिर–चरण (१.१) | one with beautiful feet (rays) |
| सूतोरुश्रीसनाथरथः | सूत–उरु–श्री–सनाथ–रथ (१.१) | whose chariot is endowed with the great splendour of its charioteer |
| शनिम् | शनि (२.१) | Shani (Saturn) |
| शमनम् | शमन (२.१) | Shamana (Yama) |
| अपि | अपि | also |
| सः | तद् (१.१) | he |
| त्रातुम् | त्रातुम् (√त्रै+तुमुन्) | to protect |
| लोकान् | लोक (२.३) | the worlds |
| असूत | असूत (√सू कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | produced |
| सुतौ | सुत (२.२) | two sons |
| इति | इति | thus |
| रथपदकृपासिन्धुः | रथपद–कृपा–सिन्धु (१.१) | an ocean of compassion for the Chakravaka birds |
| बन्धुः | बन्धु (१.१) | a friend |
| दृशाम् | दृश् (६.३) | of the eyes |
| अपि | अपि | even |
| दुर्जनैः | दुर्जन (३.३) | by wicked people |
| यत् | यद् | since |
| उपहसितः | उपहसित (उप√हस्+क्त, १.१) | is ridiculed |
| भास्वान् | भास्वत् (१.१) | the sun |
| न | न | not |
| अस्मान् | अस्मद् (२.३) | us |
| हसिष्यति | हसिष्यति (√हस् कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will laugh at |
| कः | किम् (१.१) | what |
| खलः | खल (१.१) | wicked person |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रु | चि | र | च | र | णः | सू | तो | रु | श्री | स | ना | थ | र | थः | श | निं |
| श | म | न | म | पि | स | त्रा | तुं | लो | का | न | सू | त | सु | ता | वि | ति |
| र | थ | प | द | कृ | पा | सि | न्धु | र्ब | न्धु | र्दृ | शा | म | पि | दु | र्ज | नै |
| र्य | दु | प | ह | सि | तो | भा | स्वा | न्ना | स्मा | न्ह | सि | ष्य | ति | कः | ख | लः |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
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