दहनमविशद्दीप्तिर्यास्तं गते गतवासर-
प्रशमसमयप्राप्ते पत्यौ विवस्वति रागिणि ।
अधरभुवनात्सोद्धृत्यैषा हठात्तरणेः कृता-
मरपतिपुरप्राप्तिर्धत्ते सतीव्रतमूर्तिताम् ॥
दहनमविशद्दीप्तिर्यास्तं गते गतवासर-
प्रशमसमयप्राप्ते पत्यौ विवस्वति रागिणि ।
अधरभुवनात्सोद्धृत्यैषा हठात्तरणेः कृता-
मरपतिपुरप्राप्तिर्धत्ते सतीव्रतमूर्तिताम् ॥
प्रशमसमयप्राप्ते पत्यौ विवस्वति रागिणि ।
अधरभुवनात्सोद्धृत्यैषा हठात्तरणेः कृता-
मरपतिपुरप्राप्तिर्धत्ते सतीव्रतमूर्तिताम् ॥
अन्वयः
AI
गत-वासर-प्रशम-समय-प्राप्ते रागिणि पत्यौ विवस्वति अस्तम् गते (सति), या दीप्तिः दहनम् अविशत्, सा एषा तरणेः दीप्तिः अधर-भुवनात् हठात् उद्धृत्य कृत-अमरपति-पुर-प्राप्तिः (सती) सती-व्रत-मूर्तिताम् धत्ते ।
Summary
AI
When her ruddy husband, the sun, set at the end of the day, his brilliance entered the fire. Now, this same brilliance of the sun, having been forcibly lifted from the nether world and having reached heaven, assumes the form of an embodiment of a Sati's vow.
पदच्छेदः
AI
| दहनम् | दहन (२.१) | fire |
| अविशत् | अविशत् (√विश् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | entered |
| दीप्तिः | दीप्ति (१.१) | the brilliance |
| या | यद् (१.१) | which |
| अस्तम् | अस्तम् | setting |
| गते | गत (√गम्+क्त, ७.१) | having gone |
| गतवासरप्रशमसमयप्राप्ते | गत–वासर–प्रशम–समय–प्राप्त (√आप्+क्त, ७.१) | who had reached the time of the end of the past day |
| पत्यौ | पति (७.१) | husband |
| विवस्वति | विवस्वत् (७.१) | the sun |
| रागिणि | रागिन् (७.१) | ruddy/passionate |
| अधरभुवनात् | अधर–भुवन (५.१) | from the nether world |
| सा | तद् (१.१) | that |
| उद्धृत्य | उद्धृत्य (उद्√हृ+ल्यप्) | having been lifted up |
| एषा | एतद् (१.१) | this |
| हठात् | हठात् | forcibly |
| तरणेः | तरणि (६.१) | of the sun |
| कृतामरपतिपुरप्राप्तिः | कृत (√कृ+क्त)–अमरपति–पुर–प्राप्ति (१.१) | who has achieved arrival at the city of the lord of gods |
| धत्ते | धत्ते (√धा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | assumes |
| सतीव्रतमूर्तिताम् | सती–व्रत–मूर्ति–ता (२.१) | the state of being an embodiment of a Sati's vow |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | ह | न | म | वि | श | द्दी | प्ति | र्या | स्तं | ग | ते | ग | त | वा | स | र |
| प्र | श | म | स | म | य | प्रा | प्ते | प | त्यौ | वि | व | स्व | ति | रा | गि | णि |
| अ | ध | र | भु | व | ना | त्सो | द्धृ | त्यै | षा | ह | ठा | त्त | र | णेः | कृ | ता |
| म | र | प | ति | पु | र | प्रा | प्ति | र्ध | त्ते | स | ती | व्र | त | मू | र्ति | ताम् |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.