कमलकुशलाधाने भानोरहो पुरुषाव्रतं
यदुपकुरुते नेत्राणि श्रीगृहत्वविवक्षुभिः ।
कविभिरुपमानादप्यम्भोजतां गमितान्यसा-
वपि यदतथाभावान्मुञ्चत्युलूकविलोचने ॥
कमलकुशलाधाने भानोरहो पुरुषाव्रतं
यदुपकुरुते नेत्राणि श्रीगृहत्वविवक्षुभिः ।
कविभिरुपमानादप्यम्भोजतां गमितान्यसा-
वपि यदतथाभावान्मुञ्चत्युलूकविलोचने ॥
यदुपकुरुते नेत्राणि श्रीगृहत्वविवक्षुभिः ।
कविभिरुपमानादप्यम्भोजतां गमितान्यसा-
वपि यदतथाभावान्मुञ्चत्युलूकविलोचने ॥
अन्वयः
AI
अहो, भानोः कमलकुशलाधाने पुरुष-अवव्रतम् (अस्ति) । यत् (भानुः) श्रीगृहत्वविवक्षुभिः कविभिः उपमानात् अपि अम्भोजतां गमितानि नेत्राणि उपकुरुते, यत् च असौ उलूकविलोचने अतथाभावात् मुञ्चति ।
Summary
AI
Oh, the sun's vow of impartiality in making lotuses prosper is remarkable! It helps the eyes of women, which poets, wishing to call them abodes of beauty, have elevated to the status of lotuses through comparison. At the same time, it abandons the eyes of the owl precisely because they are not like lotuses (and cannot bear light).
पदच्छेदः
AI
| कमलकुशलाधाने | कमल–कुशल–आधान (७.१) | in promoting the well-being of lotuses |
| भानोः | भानु (६.१) | of the sun |
| अहो | अहो | Oh! |
| पुरुषाव्रतम् | पुरुष–अवव्रत (१.१) | a vow of impartiality |
| यत् | यत् | that |
| उपकुरुते | उपकुरुते (उप√कृ कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | it helps |
| नेत्राणि | नेत्र (२.३) | the eyes |
| श्रीगृहत्वविवक्षुभिः | श्री–गृहत्व–विवक्षु (३.३) | by those wishing to express the state of being an abode of beauty |
| कविभिः | कवि (३.३) | by poets |
| उपमानात् | उपमान (५.१) | from comparison |
| अपि | अपि | even |
| अम्भोजताम् | अम्भोजता (२.१) | the state of being a lotus |
| गमितानि | गमित (√गम्+णिच्+क्त, २.३) | made to attain |
| असौ | अदस् (१.१) | he (the sun) |
| अपि | अपि | also |
| यत् | यत् | that |
| अतथाभावात् | अतथा–भाव (५.१) | from the state of not being so |
| मुञ्चति | मुञ्चति (√मुच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | abandons |
| उलूकविलोचने | उलूक–विलोचन (२.२) | the two eyes of the owl |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | म | ल | कु | श | ला | धा | ने | भा | नो | र | हो | पु | रु | षा | व्र | तं |
| य | दु | प | कु | रु | ते | ने | त्रा | णि | श्री | गृ | ह | त्व | वि | व | क्षु | भिः |
| क | वि | भि | रु | प | मा | ना | द | प्य | म्भो | ज | तां | ग | मि | ता | न्य | सा |
| व | पि | य | द | त | था | भा | वा | न्मु | ञ्च | त्यु | लू | क | वि | लो | च | ने |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.