जगति मिथुने चक्रावेव स्मरागमपारगौ
नवमिव मिथः संभुञ्जाते वियुज्य वियुज्य यौ ।
सततममृतादेवाहाराद्युदापदरोचकं
तदमृतभुजां भर्ता शंभुर्विषां बुभुजे विभुः ॥
जगति मिथुने चक्रावेव स्मरागमपारगौ
नवमिव मिथः संभुञ्जाते वियुज्य वियुज्य यौ ।
सततममृतादेवाहाराद्युदापदरोचकं
तदमृतभुजां भर्ता शंभुर्विषां बुभुजे विभुः ॥
नवमिव मिथः संभुञ्जाते वियुज्य वियुज्य यौ ।
सततममृतादेवाहाराद्युदापदरोचकं
तदमृतभुजां भर्ता शंभुर्विषां बुभुजे विभुः ॥
अन्वयः
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जगति मिथुने यौ चक्रौ एव स्मरागमपारगौ (स्तः), (तौ) मिथः वियुज्य वियुज्य नवम् इव सम्भुञ्जाते । तत् विभुः अमृतभुजाम् भर्ता शम्भुः सततम् अमृतात् एव आहारात् उदापदरोचकं विषाम् बुभुजे ।
Summary
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Among couples in the world, only the Chakravaka birds are true masters of the science of love, for after each separation, they enjoy each other as if for the first time. For this reason, the all-pervading Lord Shiva, master of the gods, consumed poison, as the constant diet of nectar had become distasteful to him (implying separation enhances love, which he experienced, making monotony unbearable).
पदच्छेदः
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| जगति | जगत् (७.१) | in the world |
| मिथुने | मिथुन (७.१) | among couples |
| चक्रौ | चक्र (१.२) | the two Chakravaka birds |
| एव | एव | only |
| स्मरागमपारगौ | स्मर–आगम–पारग (१.२) | who are masters of the science of love |
| नवम् | नव (२.१) | new |
| इव | इव | as if |
| मिथः | मिथः | mutually |
| संभुञ्जाते | संभुञ्जाते (सम्√भुज् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. द्वि.) | they enjoy |
| वियुज्य | वियुज्य (वि√युज्+ल्यप्) | having been separated |
| वियुज्य | वियुज्य (वि√युज्+ल्यप्) | having been separated |
| यौ | यद् (१.२) | which two |
| सततम् | सततम् | always |
| अमृतात् | अमृत (५.१) | from nectar |
| एव | एव | only |
| आहारात् | आहार (५.१) | from food |
| उदापदरोचकम् | आपत् (आ√पद्)–अरोचक (२.१) | distaste arising from |
| तत् | तत् | therefore |
| अमृतभुजाम् | अमृतभुज् (६.३) | of the gods |
| भर्ता | भर्तृ (१.१) | the lord |
| शम्भुः | शम्भु (१.१) | Shambhu (Shiva) |
| विषाम् | विष (२.१) | poison |
| बुभुजे | बुभुजे (√भुज् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | consumed |
| विभुः | विभु (१.१) | the all-pervading one |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | ग | ति | मि | थु | ने | च | क्रा | वे | व | स्म | रा | ग | म | पा | र | गौ |
| न | व | मि | व | मि | थः | सं | भु | ञ्जा | ते | वि | यु | ज्य | वि | यु | ज्य | यौ |
| स | त | त | म | मृ | ता | दे | वा | हा | रा | द्यु | दा | प | द | रो | च | कं |
| त | द | मृ | त | भु | जां | भ | र्ता | शं | भु | र्वि | षां | बु | भु | जे | वि | भुः |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
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