रहसहचरीमेतां राजन्नपि स्त्रितमां क्षणं
तरणिकिरणैः स्तोकान्मुक्तैः समालभते नभः ।
उदधिनिरयद्भास्वत्स्वर्णोदकुम्भदिदृक्षुतां
दधति नलिनं प्रस्थायिन्यः श्रियः कुमुदान्मुदा ॥
रहसहचरीमेतां राजन्नपि स्त्रितमां क्षणं
तरणिकिरणैः स्तोकान्मुक्तैः समालभते नभः ।
उदधिनिरयद्भास्वत्स्वर्णोदकुम्भदिदृक्षुतां
दधति नलिनं प्रस्थायिन्यः श्रियः कुमुदान्मुदा ॥
तरणिकिरणैः स्तोकान्मुक्तैः समालभते नभः ।
उदधिनिरयद्भास्वत्स्वर्णोदकुम्भदिदृक्षुतां
दधति नलिनं प्रस्थायिन्यः श्रियः कुमुदान्मुदा ॥
अन्वयः
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राजन्, नभः अपि एताम् रहः-सहचरीम् स्त्रितमाम् क्षणम् स्तोक-उन्मुक्तैः तरणि-किरणैः समालभते । प्रस्थायिन्यः श्रियः मुदा कुमुदात् उदधि-निर्यत्-भास्वत्-स्वर्ण-उदकुम्भ-दिदृक्षुताम् दधति (सत्यः) नलिनम् (यान्ति) ।
Summary
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O King, even the sky anoints this most feminine companion of solitude (the evening) for a moment with the faintly remaining rays of the sun. The departing splendors joyfully leave the night-lotus and go to the day-lotus, holding a desire to see the rising sun, like a shining golden water-pot emerging from the ocean.
पदच्छेदः
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| रहः-सहचरीम् | रहस्–सहचरी (२.१) | this companion of solitude |
| एताम् | एतद् (२.१) | this |
| राजन् | राजन् (८.१) | O King |
| अपि | अपि | even |
| स्त्रितमाम् | स्त्रीतम (२.१) | most feminine |
| क्षणम् | क्षण (२.१) | for a moment |
| तरणि-किरणैः | तरणि–किरण (३.३) | with the rays of the sun |
| स्तोक-उन्मुक्तैः | स्तोक–उन्मुक्त (उद्√मुच्+क्त, ३.३) | faintly remaining |
| समालभते | समालभते (सम्+आ√लभ् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | anoints |
| नभः | नभस् (१.१) | the sky |
| उदधि-निर्यत्-भास्वत्-स्वर्ण-उदकुम्भ-दिदृक्षुताम् | उदधि–निर्यत् (निर्√ई+शतृ)–भास्वत्–स्वर्ण–उदकुम्भ–दिदृक्षुता (√दृश्+सन्+उ+ता, २.१) | the desire to see the shining golden water-pot emerging from the ocean |
| दधति | दधति (√धा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | holding |
| नलिनम् | नलिन (२.१) | to the day-lotus |
| प्रस्थायिन्यः | प्रस्थायिन् (प्र√स्था, १.३) | The departing |
| श्रियः | श्री (१.३) | splendors |
| कुमुदात् | कुमुद (५.१) | from the night-lotus |
| मुदा | मुद् (३.१) | with joy |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | ह | स | ह | च | री | मे | तां | रा | ज | न्न | पि | स्त्रि | त | मां | क्ष | णं |
| त | र | णि | कि | र | णैः | स्तो | का | न्मु | क्तैः | स | मा | ल | भ | ते | न | भः |
| उ | द | धि | नि | र | य | द्भा | स्व | त्स्व | र्णो | द | कु | म्भ | दि | दृ | क्षु | तां |
| द | ध | ति | न | लि | नं | प्र | स्था | यि | न्यः | श्रि | यः | कु | मु | दा | न्मु | दा |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
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