रतिरतिपतिद्वैतश्रीकौ धुरं बिभृमस्तरां
प्रियवचसि यन्नग्नाचार्या वदामतमां ततः ।
अपि विरचितो विद्मः पुण्यद्रुहः खलु नर्मणः
परुषमरुषे नैकस्यै वामुदेति मुदेऽपि तत् ॥
रतिरतिपतिद्वैतश्रीकौ धुरं बिभृमस्तरां
प्रियवचसि यन्नग्नाचार्या वदामतमां ततः ।
अपि विरचितो विद्मः पुण्यद्रुहः खलु नर्मणः
परुषमरुषे नैकस्यै वामुदेति मुदेऽपि तत् ॥
प्रियवचसि यन्नग्नाचार्या वदामतमां ततः ।
अपि विरचितो विद्मः पुण्यद्रुहः खलु नर्मणः
परुषमरुषे नैकस्यै वामुदेति मुदेऽपि तत् ॥
अन्वयः
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(हे प्रिये), यत् प्रिय-वचसि (आवयोः) नग्नाचार्याः (भवामः), ततः रति-रतिपति-द्वैत-श्रीकौ (आवयोः) धुरम् तराम् बिभृमः। तमाम् (वार्ताम्) वदाम। पुण्यद्रुहः नर्मणः परुषम् विरचितः (भवति इति) अपि विद्मः खलु। तत् (परुषं नर्म) अरुषे (सति) एकस्यै मुदे न (उदेति), अमुदे वा मुदे अपि उदेति।
Summary
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"Because we are shameless practitioners of sweet talk, we bear the yoke of the beauty of the divine couple, Rati and Kamadeva, even more. Let us speak of it. We know indeed that harshness is a part of jest that is hostile to religious merit. When there is no real anger, such jest arises not for the joy of one person alone, but also for the joy that comes from mock displeasure."
पदच्छेदः
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| रतिरतिपतिद्वैतश्रीकौ | रति–रतिपति–द्वैत–श्रीक (१.२) | bearing the beauty of the pair Rati and Kamadeva |
| धुरम् | धुर् (२.१) | the yoke |
| बिभृमः | बिभृमः (√भृ कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | we bear |
| तराम् | तराम् | exceedingly |
| प्रियवचसि | प्रिय–वचस् (७.१) | in sweet talk |
| यत् | यद् | Because |
| नग्नाचार्याः | नग्न–आचार्य (१.३) | we are shameless practitioners |
| वदाम | वदाम (√वद् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | let us speak |
| तमाम् | तद् (२.१) | of that |
| ततः | ततः | therefore |
| अपि | अपि | also |
| विरचितः | विरचित (वि√रच्+क्त, १.१) | is composed |
| विद्मः | विद्मः (√विद् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | we know |
| पुण्यद्रुहः | पुण्यद्रुह् (६.१) | of merit-destroying |
| खलु | खलु | indeed |
| नर्मणः | नर्मन् (६.१) | of jest |
| परुषम् | परुष (१.१) | harshness |
| अरुषे | अरुष् (७.१) | when there is no anger |
| न | न | not |
| एकस्यै | एक (४.१) | for one alone |
| वा | वा | or |
| अमुदेति | अमुद् (४.१)–इति | for displeasure |
| मुदे | मुद् (४.१) | for joy |
| अपि | अपि | also |
| तत् | तद् (१.१) | that |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | ति | र | ति | प | ति | द्वै | त | श्री | कौ | धु | रं | बि | भृ | म | स्त | रां |
| प्रि | य | व | च | सि | य | न्न | ग्ना | चा | र्या | व | दा | म | त | मां | त | तः |
| अ | पि | वि | र | चि | तो | वि | द्मः | पु | ण्य | द्रु | हः | ख | लु | न | र्म | णः |
| प | रु | ष | म | रु | षे | नै | क | स्यै | वा | मु | दे | ति | मु | दे | ऽपि | तत् |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
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