जय जय महाराज प्राभातिकीं सुषमामिमां
सफलयत मां दानादक्ष्णोर्दरालसपक्ष्मणी ।
प्रथमशकुनं शय्योत्थायं तवास्तु विदर्भजा
प्रियजनमुखाम्भोजात्तुङ्गं यदङ्ग न मङ्गलम् ॥
जय जय महाराज प्राभातिकीं सुषमामिमां
सफलयत मां दानादक्ष्णोर्दरालसपक्ष्मणी ।
प्रथमशकुनं शय्योत्थायं तवास्तु विदर्भजा
प्रियजनमुखाम्भोजात्तुङ्गं यदङ्ग न मङ्गलम् ॥
सफलयत मां दानादक्ष्णोर्दरालसपक्ष्मणी ।
प्रथमशकुनं शय्योत्थायं तवास्तु विदर्भजा
प्रियजनमुखाम्भोजात्तुङ्गं यदङ्ग न मङ्गलम् ॥
अन्वयः
AI
(हे) महाराज, जय जय। दरालसपक्ष्मणी अक्ष्णोः दानात् माम् इमाम् प्राभातिकीम् सुषमाम् सफलयत। तव शय्योत्थायम् प्रथमशकुनम् विदर्भजा अस्तु। (हे) अङ्ग, यत् प्रियजनमुखाम्भोजात् तुङ्गम् मङ्गलम् न (अस्ति)।
Summary
AI
Bards hail King Nala, "Victory, O great king! By the gift of your eyes, with their slightly languid lashes, make this morning beauty fruitful for me. Let the daughter of Vidarbha (Damayanti) be the first good omen upon your rising from bed. For, O dear king, what greater blessing is there than the lotus-face of a loved one?"
पदच्छेदः
AI
| जय | जय (√जि कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | Victory |
| जय | जय (√जि कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | victory |
| महाराज | महाराज (८.१) | O great king |
| प्राभातिकीम् | प्राभातिकी (२.१) | morning |
| सुषमाम् | सुषमा (२.१) | beauty |
| इमाम् | इदम् (२.१) | this |
| सफलयत | सफलयत (√सफलय कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. बहु.) | make fruitful |
| माम् | अस्मद् (२.१) | for me |
| दानात् | दान (५.१) | by the gift |
| अक्ष्णोः | अक्षिन् (६.२) | of your two eyes |
| दरालसपक्ष्मणी | दरालसपक्ष्मन् (६.२) | whose lashes are slightly languid |
| प्रथमशकुनम् | प्रथमशकुन (१.१) | the first good omen |
| शय्योत्थायम् | शय्या–उत्थाय (१.१) | rising from bed |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| अस्तु | अस्तु (√अस् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let be |
| विदर्भजा | विदर्भजा (१.१) | the daughter of Vidarbha (Damayanti) |
| प्रियजनमुखाम्भोजात् | प्रियजन–मुख–अम्भोज (५.१) | than the lotus-face of a loved one |
| तुङ्गम् | तुङ्ग (१.१) | higher |
| यत् | यद् | because |
| अङ्ग | अङ्ग (८.१) | O dear one |
| न | न | not |
| मङ्गलम् | मङ्गल (१.१) | a blessing |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | य | ज | य | म | हा | रा | ज | प्रा | भा | ति | कीं | सु | ष | मा | मि | मां |
| स | फ | ल | य | त | मां | दा | ना | द | क्ष्णो | र्द | रा | ल | स | प | क्ष्म | णी |
| प्र | थ | म | श | कु | नं | श | य्यो | त्था | यं | त | वा | स्तु | वि | द | र्भ | जा |
| प्रि | य | ज | न | मु | खा | म्भो | जा | त्तु | ङ्गं | य | द | ङ्ग | न | म | ङ्ग | लम् |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.