उडुपरिषदः किं नार्हत्वं निशः किमु नौचिती
पतिरिह न यद्दृष्टस्ताभ्यां गणेयरुचीगणः ।
स्फुटमुडुपतेराश्मं वक्षः स्फुरन्मलिनाश्मन-
श्छवि यदनयोर्विच्छेदेऽपि द्रुतं बत न द्रुतम् ॥
उडुपरिषदः किं नार्हत्वं निशः किमु नौचिती
पतिरिह न यद्दृष्टस्ताभ्यां गणेयरुचीगणः ।
स्फुटमुडुपतेराश्मं वक्षः स्फुरन्मलिनाश्मन-
श्छवि यदनयोर्विच्छेदेऽपि द्रुतं बत न द्रुतम् ॥
पतिरिह न यद्दृष्टस्ताभ्यां गणेयरुचीगणः ।
स्फुटमुडुपतेराश्मं वक्षः स्फुरन्मलिनाश्मन-
श्छवि यदनयोर्विच्छेदेऽपि द्रुतं बत न द्रुतम् ॥
अन्वयः
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यत् इह ताभ्याम् (उडुपरिषदा निशा च) गणेय-रुची-गणः पतिः (चन्द्रः) न दृष्टः, (तत्) उडु-परिषदः किम् न अर्हत्वम्? निशः किमु न औचिती? यत् अनयोः विच्छेदे अपि स्फुटम् स्फुरत्-मलिन-अश्मनः छवि उडु-पतेः आश्मम् वक्षः द्रुतम् न द्रुतम्, बत।
Summary
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Since their husband (the moon), whose rays had become countable, was not seen by the assembly of stars and the night as he set, was this not a mark of their dignity and propriety? Alas, it is clear the moon's chest is made of stone, with the lustre of a dark gem, for it did not melt with grief even at this separation.
पदच्छेदः
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| उडुपरिषदः | उडु–परिषद् (६.१) | of the assembly of stars |
| किम् | किम् | was it |
| न | न | not |
| अर्हत्वम् | अर्हत्व (१.१) | a sign of worthiness |
| निशः | निश् (६.१) | of the night |
| किमु | किमु | was it |
| न | न | not |
| औचिती | औचिती (१.१) | propriety |
| पतिः | पति (१.१) | the husband (moon) |
| इह | इह | here |
| न | न | not |
| यत् | यद् | Since |
| दृष्टः | दृष्ट (√दृश्+क्त, १.१) | was seen |
| ताभ्याम् | तद् (३.२) | by them two |
| गणेयरुचीगणः | गणेय–रुच्–गण (१.१) | whose host of rays was countable |
| स्फुटम् | स्फुटम् | clearly |
| उडुपतेः | उडु–पति (६.१) | of the moon |
| आश्मम् | आश्म (१.१) | stony |
| वक्षः | वक्षस् (१.१) | chest |
| स्फुरन्मलिनाश्मनश्छवि | स्फुरत्–मलिन–अश्मन्–छवि (१.१) | having the lustre of a shining dark gem |
| यत् | यद् | because |
| अनयोः | इदम् (६.२) | of these two |
| विच्छेदे | विच्छेद (७.१) | at the separation |
| अपि | अपि | even |
| द्रुतम् | द्रुतम् | quickly |
| बत | बत | alas |
| न | न | not |
| द्रुतम् | द्रुत (√द्रु+क्त, १.१) | melted |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | डु | प | रि | ष | दः | किं | ना | र्ह | त्वं | नि | शः | कि | मु | नौ | चि | ती |
| प | ति | रि | ह | न | य | द्दृ | ष्ट | स्ता | भ्यां | ग | णे | य | रु | ची | ग | णः |
| स्फु | ट | मु | डु | प | ते | रा | श्मं | व | क्षः | स्फु | र | न्म | लि | ना | श्म | न |
| श्छ | वि | य | द | न | यो | र्वि | च्छे | दे | ऽपि | द्रु | तं | ब | त | न | द्रु | तम् |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
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