एककस्य शमने परं पुन-
र्जाग्रतं शमितमप्यवेक्ष्य तम् ।
जातवह्निवरसंस्मृतिः शिरः
सा विधूय निमिमील केवलम् ॥
एककस्य शमने परं पुन-
र्जाग्रतं शमितमप्यवेक्ष्य तम् ।
जातवह्निवरसंस्मृतिः शिरः
सा विधूय निमिमील केवलम् ॥
र्जाग्रतं शमितमप्यवेक्ष्य तम् ।
जातवह्निवरसंस्मृतिः शिरः
सा विधूय निमिमील केवलम् ॥
अन्वयः
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सा एककस्य शमने, परम् जाग्रतम्, शमितम् अपि तम् पुनः (जाग्रतम्) अवेक्ष्य, जात-वह्नि-वर-संस्मृतिः शिरः विधूय केवलम् निमिमील।
Summary
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Upon extinguishing one light (on her cheek), she saw the other one still shining, and even the extinguished one shining again. Remembering the boon from Agni (which gave her a radiant body), she shook her head and simply closed her eyes.
पदच्छेदः
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| एककस्य | एकक (६.१) | of one |
| शमने | शमन (७.१) | upon extinguishing |
| परं | पर (२.१) | the other |
| पुनः | पुनर् | again |
| जाग्रतं | जाग्रत् (√जागृ+शतृ, २.१) | shining |
| शमितम् | शमित (√शम्+णिच्+क्त, २.१) | the extinguished one |
| अपि | अपि | also |
| अवेक्ष्य | अवेक्ष्य (अव√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| तम् | तद् (२.१) | it |
| जातवह्निवरसंस्मृतिः | जात–वह्नि–वर–संस्मृति (१.१) | she who remembered the boon from Agni |
| शिरः | शिरस् (२.१) | head |
| सा | तद् (१.१) | she |
| विधूय | विधूय (वि√धू+ल्यप्) | having shaken |
| निमिमील | निमिमील (नि√मील् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | she closed her eyes |
| केवलम् | केवलम् | only |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | क | क | स्य | श | म | ने | प | रं | पु | न |
| र्जा | ग्र | तं | श | मि | त | म | प्य | वे | क्ष्य | तम् |
| जा | त | व | ह्नि | व | र | सं | स्मृ | तिः | शि | रः |
| सा | वि | धू | य | नि | मि | मी | ल | के | व | लम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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