तं पिधाय मुदिताथ पार्श्वयो-
र्वीक्ष्य दीपमुभयत्र सा स्वयोः ।
चित्तमाप कुतुकाद्भुतत्रपा-
तङ्कसंकटनिवेशितस्मरम् ॥
तं पिधाय मुदिताथ पार्श्वयो-
र्वीक्ष्य दीपमुभयत्र सा स्वयोः ।
चित्तमाप कुतुकाद्भुतत्रपा-
तङ्कसंकटनिवेशितस्मरम् ॥
र्वीक्ष्य दीपमुभयत्र सा स्वयोः ।
चित्तमाप कुतुकाद्भुतत्रपा-
तङ्कसंकटनिवेशितस्मरम् ॥
अन्वयः
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अथ सा तम् पिधाय मुदिता, स्वयोः पार्श्वयोः उभयत्र दीपम् वीक्ष्य, कुतुक-अद्भुत-त्रपा-आतङ्क-सङ्कट-निवेशित-स्मरम् चित्तम् आप।
Summary
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Then, delighted after covering the jewel, she saw a light on both of her own sides (reflected from her glowing cheeks). Her mind then entered a state where love was caught in a dilemma of curiosity, wonder, shame, and fear.
पदच्छेदः
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| तं | तद् (२.१) | it |
| पिधाय | पिधाय (अपि√धा+ल्यप्) | having covered |
| मुदिता | मुदित (√मुद्+क्त, १.१) | delighted |
| अथ | अथ | then |
| पार्श्वयोः | पार्श्व (७.२) | on both sides |
| वीक्ष्य | वीक्ष्य (वि√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| दीपम् | दीप (२.१) | a lamp |
| उभयत्र | उभयत्र | in both places |
| सा | तद् (१.१) | she |
| स्वयोः | स्व (७.२) | of her own |
| चित्तम् | चित्त (२.१) | mind |
| आप | आप (√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | she obtained |
| कुतुकाद्भुतत्रपातङ्कसंकटनिवेशितस्मरम् | कुतुक–अद्भुत–त्रपा–आतङ्क–सङ्कट–निवेशित (√विश्+णिच्+क्त)–स्मर (२.१) | a state where love was placed in the dilemma of curiosity, wonder, shame, and fear |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तं | पि | धा | य | मु | दि | ता | थ | पा | र्श्व | यो |
| र्वी | क्ष्य | दी | प | मु | भ | य | त्र | सा | स्व | योः |
| चि | त्त | मा | प | कु | तु | का | द्भु | त | त्र | पा |
| त | ङ्क | सं | क | ट | नि | वे | शि | त | स्म | रम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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