येन तन्मदनवह्निना स्थितं
ह्रीमहौषधिनिरुद्धशक्तिना ।
सिद्धिमद्भिरुदतेजि तैः पुनः
स प्रियप्रियवचोभिमन्त्रणैः ॥
येन तन्मदनवह्निना स्थितं
ह्रीमहौषधिनिरुद्धशक्तिना ।
सिद्धिमद्भिरुदतेजि तैः पुनः
स प्रियप्रियवचोभिमन्त्रणैः ॥
ह्रीमहौषधिनिरुद्धशक्तिना ।
सिद्धिमद्भिरुदतेजि तैः पुनः
स प्रियप्रियवचोभिमन्त्रणैः ॥
अन्वयः
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येन ह्री-महौषधि-निरुद्ध-शक्तिना मदनवह्निना स्थितम्, सः पुनः तैः सिद्धिमद्भिः प्रिय-प्रिय-वचोभि-मन्त्रणैः उदतेजि।
Summary
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The fire of love, whose power had been suppressed by the great herb of Damayanti's modesty, was kindled again by Nala's efficacious incantations in the form of very dear and loving words.
पदच्छेदः
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| येन | यद् (३.१) | by which |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| मदनवह्निना | मदन–वह्नि (३.१) | by the fire of love |
| स्थितम् | स्थित (√स्था+क्त, १.१) | it was remained |
| ह्रीमहौषधिनिरुद्धशक्तिना | ह्री–महा–ओषधि–निरुद्ध (नि√रुध्+क्त)–शक्ति (३.१) | whose power was suppressed by the great herb of modesty |
| सिद्धिमद्भिः | सिद्धिमत् (३.३) | by the efficacious |
| उदतेजि | उदतेजि (उद्√तज् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was kindled |
| तैः | तद् (३.३) | by those |
| पुनः | पुनर् | again |
| सः | तद् (१.१) | it (the fire) |
| प्रियप्रियवचोभिमन्त्रणैः | प्रिय–प्रिय–वचस्–मन्त्रण (३.३) | by the incantations of very dear words |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ये | न | त | न्म | द | न | व | ह्नि | ना | स्थि | तं |
| ह्री | म | हौ | ष | धि | नि | रु | द्ध | श | क्ति | ना |
| सि | द्धि | म | द्भि | रु | द | ते | जि | तैः | पु | नः |
| स | प्रि | य | प्रि | य | व | चो | भि | म | न्त्र | णैः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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