नाविलोक्य नलमासितुं स्मरो
ह्रीर्न वीक्षितुमदत्त सुभ्रुवः ।
तद्दृशः पतिदिशाचलन्नथ
व्रीडिताः समकुचन्मुहुः पथः ॥
नाविलोक्य नलमासितुं स्मरो
ह्रीर्न वीक्षितुमदत्त सुभ्रुवः ।
तद्दृशः पतिदिशाचलन्नथ
व्रीडिताः समकुचन्मुहुः पथः ॥
ह्रीर्न वीक्षितुमदत्त सुभ्रुवः ।
तद्दृशः पतिदिशाचलन्नथ
व्रीडिताः समकुचन्मुहुः पथः ॥
अन्वयः
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स्मरः नलम् अविलोक्य आसितुम् न अदत्त । ह्रीः वीक्षितुम् न अदत्त । अथ पति-दिशा चलन्तः सुभ्रुवः तद्दृशः पथः व्रीडिताः (सन्तः) मुहुः समकुचन् ।
Summary
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Love did not allow her to remain without seeing Nala, while shyness did not allow her to see him. Therefore, the paths of the beautiful-browed one's gaze, moving in her husband's direction, repeatedly contracted as if ashamed.
पदच्छेदः
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| न | न | not |
| अविलोक्य | अविलोक्य (अव√लोक्+ल्यप्) | seeing |
| नलम् | नल (२.१) | Nala |
| आसितुम् | आसितुम् (√आस्+तुमुन्) | to stay |
| स्मरः | स्मर (१.१) | Kama/love |
| ह्रीः | ह्री (१.१) | shyness |
| न | न | not |
| वीक्षितुम् | वीक्षितुम् (वि√ईक्ष्+तुमुन्) | to see |
| अदत्त | अदत्त (√दा कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | allowed |
| सुभ्रुवः | सुभ्रू (६.१) | of the beautiful-browed one |
| तद्दृशः | तद्–दृश् (६.१) | of her eye |
| पतिदिशा | पति–दिशा (३.१) | in the direction of her husband |
| चलन् | चलत् (√चल्+शतृ, १.३) | moving |
| अथ | अथ | then |
| व्रीडिताः | व्रीडित (√व्रीड्+क्त, १.३) | ashamed |
| समकुचन् | समकुचन् (सम्√कुच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | contracted |
| मुहुः | मुहुर् | again and again |
| पथः | पथिन् (१.३) | the paths (of her gaze) |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ना | वि | लो | क्य | न | ल | मा | सि | तुं | स्म | रो |
| ह्री | र्न | वी | क्षि | तु | म | द | त्त | सु | भ्रु | वः |
| त | द्दृ | शः | प | ति | दि | शा | च | ल | न्न | थ |
| व्री | डि | ताः | स | म | कु | च | न्मु | हुः | प | थः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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