दूत्यसंगतिगतं यदात्मनः
प्रागशिश्रवदियं प्रियं गिरः ।
तं विचिन्त्य विनयव्ययं ह्रिया
न स्म वेद करवाणि कीदृशम् ॥
दूत्यसंगतिगतं यदात्मनः
प्रागशिश्रवदियं प्रियं गिरः ।
तं विचिन्त्य विनयव्ययं ह्रिया
न स्म वेद करवाणि कीदृशम् ॥
प्रागशिश्रवदियं प्रियं गिरः ।
तं विचिन्त्य विनयव्ययं ह्रिया
न स्म वेद करवाणि कीदृशम् ॥
अन्वयः
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इयं प्राक् आत्मनः प्रियं यत् गिरः अशिश्रवत्, दूत्य-संगति-गतं तं विनय-व्ययं विचिन्त्य, ह्रिया 'कीदृशं करवाणि' इति न वेद स्म ।
Summary
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This Damayanti, recalling the loss of modesty involved in the words she had previously spoken to her beloved in the context of his own messengership, became so ashamed that she did not know what to do.
पदच्छेदः
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| दूत्य | दूत्य | messenger-ship |
| संगति | संगति | context |
| गतम् | गत (√गम्+क्त, २.१) | related to |
| यत् | यद् (२.३) | which |
| आत्मनः | आत्मन् (६.१) | of herself |
| प्राक् | प्राच् | before |
| अशिश्रवत् | अशिश्रवत् (√श्रु +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | she had spoken |
| इयम् | इदम् (१.१) | this one |
| प्रियम् | प्रिय (२.१) | to her beloved |
| गिरः | गिर् (२.३) | words |
| तम् | तद् (२.१) | that |
| विचिन्त्य | विचिन्त्य (वि√चिन्त्+ल्यप्) | having recalled |
| विनय | विनय | modesty's |
| व्ययम् | व्यय (२.१) | loss |
| ह्रिया | ह्री (३.१) | due to shame |
| न | न | not |
| स्म | स्म | (makes it past tense) |
| वेद | वेद (√विद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | she knew |
| करवाणि | करवाणि (√कृ कर्तरि लोट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | shall I do |
| कीदृशम् | कीदृश (२.१) | what kind of (action) |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दू | त्य | सं | ग | ति | ग | तं | य | दा | त्म | नः |
| प्रा | ग | शि | श्र | व | दि | यं | प्रि | यं | गि | रः |
| तं | वि | चि | न्त्य | वि | न | य | व्य | यं | ह्रि | या |
| न | स्म | वे | द | क | र | वा | णि | की | दृ | शम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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