यत्र मत्तकलविङ्कशीलिता-
श्लीलकेलिपुनरुक्तवत्तयोः ।
क्वापि दृष्टिभिरवापि वापिको-
त्तंसहंसमिथुनस्मरोत्सवः ॥
यत्र मत्तकलविङ्कशीलिता-
श्लीलकेलिपुनरुक्तवत्तयोः ।
क्वापि दृष्टिभिरवापि वापिको-
त्तंसहंसमिथुनस्मरोत्सवः ॥
श्लीलकेलिपुनरुक्तवत्तयोः ।
क्वापि दृष्टिभिरवापि वापिको-
त्तंसहंसमिथुनस्मरोत्सवः ॥
अन्वयः
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यत्र तयोः दृष्टिभिः क्वापि मत्त-कलविङ्क-शीलित-अश्लील-केलि-पुनरुक्तवत् वापिका-उत्तंस-हंस-मिथुन-स्मरोत्सवः अवापि ।
Summary
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Where, through the glances of those two (Nala and Damayanti), the festival of love of a swan couple, who were like ornaments to a step-well, was perceived somewhere, as if it were a repetition of the indecent amorous play practiced by intoxicated sparrows.
पदच्छेदः
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| यत्र | यत्र | where |
| मत्त | मत्त (√मद्+क्त) | intoxicated |
| कलविङ्क | कलविङ्क | sparrow |
| शीलित | शीलित (√शील्+क्त) | practiced |
| अश्लील | अश्लील | indecent |
| केलि | केलि | amorous play |
| पुनरुक्तवत् | पुनरुक्तवत् | like a repetition of |
| तयोः | तद् (६.२) | of those two |
| क्वापि | क्वापि | somewhere |
| दृष्टिभिः | दृष्टि (३.३) | by the glances |
| अवापि | अवापि (√आप् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was perceived |
| वापिका | वापिका | of the step-well |
| उत्तंस | उत्तंस | ornament |
| हंस | हंस | swan |
| मिथुन | मिथुन | couple's |
| स्मरोत्सवः | स्मरोत्सव (१.१) | festival of love |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | त्र | म | त्त | क | ल | वि | ङ्क | शी | लि | ता |
| श्ली | ल | के | लि | पु | न | रु | क्त | व | त्त | योः |
| क्वा | पि | दृ | ष्टि | भि | र | वा | पि | वा | पि | को |
| त्तं | स | हं | स | मि | थु | न | स्म | रो | त्स | वः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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