श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
यातोऽस्मिञ्शिवशक्तिसिद्धिभगिनीसौभ्रात्रभव्ये महा-
काव्ये तस्य कृतौ नलीयचरिते सर्गोऽयमष्टादशः ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
यातोऽस्मिञ्शिवशक्तिसिद्धिभगिनीसौभ्रात्रभव्ये महा-
काव्ये तस्य कृतौ नलीयचरिते सर्गोऽयमष्टादशः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
यातोऽस्मिञ्शिवशक्तिसिद्धिभगिनीसौभ्रात्रभव्ये महा-
काव्ये तस्य कृतौ नलीयचरिते सर्गोऽयमष्टादशः ॥
अन्वयः
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कवि-राज-राजि-मुकुट-अलंकार-हीरः श्रीहीरः च मामल्लदेवी जितेन्द्रिय-चयम् यम् श्रीहर्षम् सुतम् सुषुवे, तस्य कृतौ शिव-शक्ति-सिद्धि-भगिनी-सौभ्रात्र-भव्ये अस्मिन् नलीय-चरिते महाकाव्ये अयम् अष्टादशः सर्गः यातः ।
Summary
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Srihira, a diamond adorning the crowns of the best poets, and Mamalladevi gave birth to a son, Sriharsha, who conquered his senses. In his work, this great epic Naishadhiyacharita, made splendid by the auspicious union of themes, this eighteenth canto has concluded.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षम् | श्रीहर्ष (२.१) | Sriharsha |
| कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः | कवि–राज–राजि–मुकुट–अलंकार–हीर (१.१) | a diamond adorning the crowns of the rows of kingly poets |
| सुतम् | सुत (२.१) | son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Srihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√षू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
| जितेन्द्रियचयम् | जित–इन्द्रिय–चय (२.१) | one who has conquered his senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| यातः | यात (√या+क्त, १.१) | has concluded |
| अस्मिन् | इदम् (७.१) | in this |
| शिवशक्तिसिद्धिभगिनीसौभ्रात्रभव्ये | शिव–शक्ति–सिद्धि–भगिनी–सौभ्रात्र–भव्य (७.१) | made splendid by auspicious union of themes |
| महाकाव्ये | महाकाव्य (७.१) | in the great epic poem |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| कृतौ | कृति (७.१) | in the work |
| नलीयचरिते | नलीय–चरित (७.१) | in the Naishadhiyacharita |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| अष्टादशः | अष्टादश (१.१) | eighteenth |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| या | तो | ऽस्मि | ञ्शि | व | श | क्ति | सि | द्धि | भ | गि | नी | सौ | भ्रा | त्र | भ | व्ये | म | हा |
| का | व्ये | त | स्य | कृ | तौ | न | ली | य | च | रि | ते | स | र्गो | ऽय | म | ष्टा | द | शः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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