संगमय्य विरहेऽस्मि जीविका
यैव वामथ रताय तत्क्षणम् ।
हन्त दत्थ इति रुष्टयावयो-
र्निद्रयाऽद्य किमु नोपसद्यते ॥
संगमय्य विरहेऽस्मि जीविका
यैव वामथ रताय तत्क्षणम् ।
हन्त दत्थ इति रुष्टयावयो-
र्निद्रयाऽद्य किमु नोपसद्यते ॥
यैव वामथ रताय तत्क्षणम् ।
हन्त दत्थ इति रुष्टयावयो-
र्निद्रयाऽद्य किमु नोपसद्यते ॥
अन्वयः
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अथ अस्मिन् विरहे वाम् या एव जीविका (आसीत्), (ताम्) संगमय्य तत्-क्षणम् रताय (अवकाशम्) हन्त दत्थ इति रुष्टया (इव) निद्रया अद्य आवयोः किम् उ न उपसद्यते?
Summary
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"Why is it that today sleep does not approach us? Is it angry, thinking, 'Alas, having united them, who survived on hope during separation, you two now give that very moment to love-making instead of me'?"
पदच्छेदः
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| संगमय्य | संगमय्य (सम्√गम्+णिच्+ल्यप्) | having brought together |
| विरहे | विरह (७.१) | in separation |
| अस्मिन् | इदम् (७.१) | in this |
| जीविका | जीविका (१.१) | means of survival |
| या | यद् (१.१) | which |
| एव | एव | only |
| वाम् | युष्मद् (६.२) | of you two |
| अथ | अथ | now |
| रताय | रत (४.१) | for love-making |
| तत्क्षणम् | तत्–क्षण (२.१) | that moment |
| हन्त | हन्त | alas |
| दत्थ | दत्थ (√दा कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. बहु.) | you two give |
| इति | इति | thus |
| रुष्टया | रुष्ट (√रुष्+क्त, ३.१) | by the angry one |
| आवयोः | अस्मद् (६.२) | of us two |
| निद्रया | निद्रा (३.१) | by sleep |
| अद्य | अद्य | today |
| किम् | किम् | why |
| उ | उ | indeed |
| न | न | not |
| उपसद्यते | उपसद्यते (उप√सद् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is approached |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | ग | म | य्य | वि | र | हे | ऽस्मि | जी | वि | का |
| यै | व | वा | म | थ | र | ता | य | त | त्क्ष | णम् |
| ह | न्त | द | त्थ | इ | ति | रु | ष्ट | या | व | यो |
| र्नि | द्र | या | ऽद्य | कि | मु | नो | प | स | द्य | ते |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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