तां विलोक्य विमुखश्रितस्मितां
पृच्छतो हसितहेतुमीशितुः ।
ह्रीमती व्यतरदुत्तरं वधूः
पाणिपङ्करुहि दर्पणार्पणाम् ॥
तां विलोक्य विमुखश्रितस्मितां
पृच्छतो हसितहेतुमीशितुः ।
ह्रीमती व्यतरदुत्तरं वधूः
पाणिपङ्करुहि दर्पणार्पणाम् ॥
पृच्छतो हसितहेतुमीशितुः ।
ह्रीमती व्यतरदुत्तरं वधूः
पाणिपङ्करुहि दर्पणार्पणाम् ॥
अन्वयः
AI
विमुख-श्रित-स्मिताम् ताम् विलोक्य हसित-हेतुम् पृच्छतः ईशितुः, ह्रीमती वधूः पाणि-पङ्करुहि दर्पण-अर्पणाम् उत्तरम् व्यतरत् ।
Summary
AI
Seeing her smiling while turning her face away, her husband asked for the reason. In response, the shy bride gave her answer by offering him a mirror held in her lotus-like hand.
पदच्छेदः
AI
| तां | तद् (२.१) | her |
| विलोक्य | विलोक्य (वि√लोक्+ल्यप्) | having seen |
| विमुखश्रितस्मितां | विमुख–श्रित–स्मिता (२.१) | who had a smile while turning her face away |
| पृच्छतः | पृच्छत् (√प्रच्छ्+शतृ, ६.१) | of him asking |
| हसितहेतुम् | हसित–हेतु (२.१) | the reason for the laughter |
| ईशितुः | ईशितृ (६.१) | of the master/husband |
| ह्रीमती | ह्रीमत् (१.१) | the shy one |
| व्यतरत् | व्यतरत् (वि√तृ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | she gave |
| उत्तरं | उत्तर (२.१) | an answer |
| वधूः | वधू (१.१) | the bride |
| पाणिपङ्करुहि | पाणि–पङ्करुह (७.१) | in her lotus-like hand |
| दर्पणार्पणाम् | दर्पण–अर्पणा (२.१) | the offering of a mirror |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तां | वि | लो | क्य | वि | मु | ख | श्रि | त | स्मि | तां |
| पृ | च्छ | तो | ह | सि | त | हे | तु | मी | शि | तुः |
| ह्री | म | ती | व्य | त | र | दु | त्त | रं | व | धूः |
| पा | णि | प | ङ्क | रु | हि | द | र्प | णा | र्प | णाम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.