ह्रीणमेव पृथु सस्मरं किय-
त्क्लान्तमेव बहुनिर्वृतं मनाक् ।
कान्तचेतसि तदीयमाननं
तत्तदालभत लक्षमादरात् ॥
ह्रीणमेव पृथु सस्मरं किय-
त्क्लान्तमेव बहुनिर्वृतं मनाक् ।
कान्तचेतसि तदीयमाननं
तत्तदालभत लक्षमादरात् ॥
त्क्लान्तमेव बहुनिर्वृतं मनाक् ।
कान्तचेतसि तदीयमाननं
तत्तदालभत लक्षमादरात् ॥
अन्वयः
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कान्त-चेतसि तदीयम् आननम् आदरात् पृथु ह्रीणम् एव, कियत् सस्मरम्, मनाक् क्लान्तम् एव, बहुनिर्वृतम् इति तत् तत् लक्षम् आलभत ।
Summary
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In her beloved's mind, her face, out of affection, took on various appearances: greatly shy, somewhat passionate, a little tired, and yet immensely satisfied.
पदच्छेदः
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| ह्रीणम् | ह्रीण (√ह्री+क्त, २.१) | shy |
| एव | एव | just/indeed |
| पृथु | पृथु | greatly |
| सस्मरं | सस्मर (२.१) | with passion |
| कियत् | कियत् | somewhat |
| क्लान्तम् | क्लान्त (√क्लम्+क्त, २.१) | tired |
| एव | एव | just/indeed |
| बहुनिर्वृतं | बहुनिर्वृत (२.१) | greatly pleased/satisfied |
| मनाक् | मनाक् | a little |
| कान्तचेतसि | कान्त–चेतस् (७.१) | in the mind of the beloved (Nala) |
| तदीयमाननं | तदीय–आनन (२.१) | her face |
| तत्तत् | तद्–तद् (२.१) | that and that |
| आलभत | आलभत (आ√लभ् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | it obtained |
| लक्षम् | लक्ष (२.१) | appearance, characteristic |
| आदरात् | आदर (५.१) | out of affection/respect |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह्री | ण | मे | व | पृ | थु | स | स्म | रं | कि | य |
| त्क्ला | न्त | मे | व | ब | हु | नि | र्वृ | तं | म | नाक् |
| का | न्त | चे | त | सि | त | दी | य | मा | न | नं |
| त | त्त | दा | ल | भ | त | ल | क्ष | मा | द | रात् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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