कुत्रचित्कनकनिर्मिताखिलः
क्वापि यो विमलरत्नजः किल ।
कुत्रचिद्रचितचित्रशालिकः
क्वापि चास्थिरविधैन्द्रजालिकः ॥
कुत्रचित्कनकनिर्मिताखिलः
क्वापि यो विमलरत्नजः किल ।
कुत्रचिद्रचितचित्रशालिकः
क्वापि चास्थिरविधैन्द्रजालिकः ॥
क्वापि यो विमलरत्नजः किल ।
कुत्रचिद्रचितचित्रशालिकः
क्वापि चास्थिरविधैन्द्रजालिकः ॥
अन्वयः
AI
यः (सौधः) कुत्रचित् कनकनिर्मिताखिलः, क्वापि किल विमलरत्नजः, कुत्रचित् रचितचित्रशालिकः, क्वापि च अस्थिरविध-ऐन्द्रजालिकः (आसीत्) ।
Summary
AI
That palace was, in some places, made entirely of gold; in others, it was born of flawless gems. Somewhere it had constructed picture galleries, and elsewhere it appeared like the work of a magician, with ever-changing forms.
पदच्छेदः
AI
| कुत्रचित् | कुत्रचित् | somewhere |
| कनकनिर्मिताखिलः | कनक–निर्मित–अखिल (१.१) | made entirely of gold |
| क्वापि | क्वापि | somewhere else |
| यः | यद् (१.१) | which (palace) |
| विमलरत्नजः | विमल–रत्नज (१.१) | born of flawless gems |
| किल | किल | indeed |
| कुत्रचित् | कुत्रचित् | somewhere |
| रचितचित्रशालिकः | रचित–चित्रशालिक (१.१) | having constructed picture galleries |
| क्वापि | क्वापि | somewhere else |
| च | च | and |
| अस्थिरविधैन्द्रजालिकः | अस्थिर–विध–ऐन्द्रजालिक (१.१) | like the work of a magician with ever-changing forms |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | त्र | चि | त्क | न | क | नि | र्मि | ता | खि | लः |
| क्वा | पि | यो | वि | म | ल | र | त्न | जः | कि | ल |
| कु | त्र | चि | द्र | चि | त | चि | त्र | शा | लि | कः |
| क्वा | पि | चा | स्थि | र | वि | धै | न्द्र | जा | लि | कः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.