वीक्ष्य वीक्ष्य पुनरैक्षि सा मुदा
पर्यरम्भि परिरभ्य चासकृत् ।
चुम्बिता पुनरचुम्बि चादरा-
त्तृप्तिरापि न कथंचनापि च ॥
वीक्ष्य वीक्ष्य पुनरैक्षि सा मुदा
पर्यरम्भि परिरभ्य चासकृत् ।
चुम्बिता पुनरचुम्बि चादरा-
त्तृप्तिरापि न कथंचनापि च ॥
पर्यरम्भि परिरभ्य चासकृत् ।
चुम्बिता पुनरचुम्बि चादरा-
त्तृप्तिरापि न कथंचनापि च ॥
अन्वयः
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सा मुदा वीक्ष्य वीक्ष्य पुनः ऐक्षि । असकृत् परिरभ्य च पर्यरम्भि । आदरात् चुम्बिता (सती) पुनः अचुम्बि च । कथञ्चन अपि तृप्तिः न आपि च ।
Summary
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Having looked and looked with joy, she was looked at again. Having embraced repeatedly, she was embraced in turn. Having been kissed with affection, she was kissed again. And yet, in no way at all was satisfaction obtained.
पदच्छेदः
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| वीक्ष्य | वीक्ष्य (वि√ईक्ष्+ल्यप्) | Having looked |
| पुनरैक्षि | पुनर्–ऐक्षि (√ईक्ष् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | again was looked at |
| सा | तद् (१.१) | she |
| मुदा | मुद् (३.१) | with joy |
| पर्यरम्भि | पर्यरम्भि (परि√रभ् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was embraced |
| परिरभ्य | परिरभ्य (परि√रभ्+ल्यप्) | having embraced |
| चासकृत् | च–असकृत् | and repeatedly |
| चुम्बिता | चुम्बित (√चुम्ब्+क्त, १.१) | Having been kissed |
| पुनरचुम्बि | पुनर्–अचुम्बि (√चुम्ब् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | again was kissed |
| चादरात्तृप्तिरापि | च–आदरात् (५.१)–तृप्तिः (१.१)–आपि (√आप् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | and with affection, satisfaction was obtained |
| न | न | not |
| कथंचनापि | कथञ्चन–अपि | in any way |
| च | च | and |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वी | क्ष्य | वी | क्ष्य | पु | न | रै | क्षि | सा | मु | दा |
| प | र्य | र | म्भि | प | रि | र | भ्य | चा | स | कृत् |
| चु | म्बि | ता | पु | न | र | चु | म्बि | चा | द | रा |
| त्तृ | प्ति | रा | पि | न | क | थं | च | ना | पि | च |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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