व्यासस्यैव गिरा तस्मिञ्श्रद्धेत्यद्धा स्थ तान्त्रिकाः ।
मत्स्यस्याप्युपदेश्यान्वः को मत्स्यानपि भाषताम् ॥
व्यासस्यैव गिरा तस्मिञ्श्रद्धेत्यद्धा स्थ तान्त्रिकाः ।
मत्स्यस्याप्युपदेश्यान्वः को मत्स्यानपि भाषताम् ॥
मत्स्यस्याप्युपदेश्यान्वः को मत्स्यानपि भाषताम् ॥
अन्वयः
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(हे) तान्त्रिकाः, (यदि) व्यासस्य गिरा एव तस्मिन् (मनौ) श्रद्धा (अस्ति) इति (वदथ), (तर्हि यूयम्) अद्धा मत्स्यस्य अपि उपदेश्यान् स्थ । कः वः मत्स्यानपि भाषताम्?
Summary
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The speaker mocks the followers of various schools of thought, saying that if their faith in Manu is based solely on Vyasa's endorsement, then they are gullible enough to be taught even by a fish. He rhetorically asks who can even bother to reason with such people.
पदच्छेदः
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| व्यासस्य | व्यास (६.१) | of Vyasa |
| एव | एव | only |
| गिरा | गिर् (३.१) | by the word |
| तस्मिन् | तद् (७.१) | in that (Manu) |
| श्रद्धा | श्रद्धा (१.१) | faith |
| इति | इति | thus |
| अद्धा | अद्धा | truly |
| स्थ | स्थ (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. बहु.) | you are |
| तान्त्रिकाः | तान्त्रिक (८.३) | O followers of the systems |
| मत्स्यस्य | मत्स्य (६.१) | of a fish |
| अपि | अपि | even |
| उपदेश्यान् | उपदेश्य (उप√दिश्+ण्यत्, १.३) | fit to be instructed |
| वः | युष्मद् (२.३) | to you |
| कः | किम् (१.१) | who |
| मत्स्यानपि | मत्स्य (२.३)–अपि | even to fish |
| भाषताम् | भाषताम् (√भाष् कर्तरि लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | let him speak |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्या | स | स्यै | व | गि | रा | त | स्मि |
| ञ्श्र | द्धे | त्य | द्धा | स्थ | ता | न्त्रि | काः |
| म | त्स्य | स्या | प्यु | प | दे | श्या | न्वः |
| को | म | त्स्या | न | पि | भा | ष | ताम् |
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