श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
यातः सप्तदशः स्वसुः सुसदृशि छिन्दप्रशस्तेर्महा-
काव्ये तद्भुवि नैषधीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
यातः सप्तदशः स्वसुः सुसदृशि छिन्दप्रशस्तेर्महा-
काव्ये तद्भुवि नैषधीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
यातः सप्तदशः स्वसुः सुसदृशि छिन्दप्रशस्तेर्महा-
काव्ये तद्भुवि नैषधीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
अन्वयः
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कविराजराजिमुकुटालङ्कारहीरः श्रीहीरः मामल्लदेवी च जितेन्द्रियचयम् यम् श्रीहर्षम् सुतम् सुषुवे, तद्भुवि छिन्दप्रशस्तेः स्वसुः सुसदृशि नैषधीयचरिते महाकाव्ये निसर्गोज्ज्वलः सप्तदशः सर्गः यातः ।
Summary
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Śrīhīra, a diamond adorning the crowns of the best poets, and Māmalladevī gave birth to their son Śrīharṣa, who had conquered his senses. In his great epic, the Naiṣadhīyacarita, which is like a beautiful sister to the Chinda praśasti, this naturally brilliant seventeenth canto has now concluded.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षम् | श्रीहर्ष (२.१) | Sriharsha |
| कविराजराजिमुकुटालङ्कारहीरः | कविराजराजि–मुकुट–अलङ्कार–हीर (१.१) | a diamond adorning the crowns of the rows of best poets |
| सुतम् | सुत (२.१) | son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Srihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√सू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
| जितेन्द्रियचयम् | जित–इन्द्रियचय (२.१) | one who has conquered his senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| यातः | यात (√या+क्त, १.१) | has concluded |
| सप्तदशः | सप्तदशन् (१.१) | the seventeenth |
| स्वसुः | स्वसृ (६.१) | of a sister |
| सुसदृशि | सुसदृश् (७.१) | very similar |
| छिन्दप्रशस्तेः | छिन्द–प्रशस्ति (६.१) | to the Chinda Prashasti |
| महाकाव्ये | महाकाव्य (७.१) | in the great epic |
| तद्भुवि | तद्भू (७.१) | born of him (Sriharsha) |
| नैषधीयचरिते | नैषधीयचरित (७.१) | in the Naishadhiyacharita |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| निसर्गोज्ज्वलः | निसर्ग–उज्ज्वल (१.१) | naturally brilliant |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| या | तः | स | प्त | द | शः | स्व | सुः | सु | स | दृ | शि | छि | न्द | प्र | श | स्ते | र्म | हा |
| का | व्ये | त | द्भु | वि | नै | ष | धी | य | च | रि | ते | स | र्गो | नि | स | र्गो | ज्ज्व | लः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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