स्फारे तादृशि वैरसेनिनगरे पुण्यैः प्रजानां घनं
विघ्नं लब्धवअश्चिरादुपनतिस्तस्मिन्किलाभूत्कलेः ।
एतस्मिन्पुनरन्तरेऽन्तरमितानन्दः स भैमीनला-
वाराद्धुं व्यधित स्मरः श्रुतिशिखावन्दारुचूडं धनुः ॥
स्फारे तादृशि वैरसेनिनगरे पुण्यैः प्रजानां घनं
विघ्नं लब्धवअश्चिरादुपनतिस्तस्मिन्किलाभूत्कलेः ।
एतस्मिन्पुनरन्तरेऽन्तरमितानन्दः स भैमीनला-
वाराद्धुं व्यधित स्मरः श्रुतिशिखावन्दारुचूडं धनुः ॥
विघ्नं लब्धवअश्चिरादुपनतिस्तस्मिन्किलाभूत्कलेः ।
एतस्मिन्पुनरन्तरेऽन्तरमितानन्दः स भैमीनला-
वाराद्धुं व्यधित स्मरः श्रुतिशिखावन्दारुचूडं धनुः ॥
अन्वयः
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तादृशि स्फारे वैरसेनिनगरे प्रजानाम् पुण्यैः घनम् विघ्नम् लब्धवतः कलेः तस्मिन् उपनतिः चिरात् किल अभूत् । पुनः एतस्मिन् अन्तरे अन्तरम् इतानन्दः सः स्मरः भैमीनलावाराद्धुम् श्रुतिशिखावन्दारुचूडम् धनुः व्यधित ।
Summary
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In that magnificent city of Nala, Kali's entry, though long sought, was greatly obstructed by the merits of the citizens. Meanwhile, in this interval, the god of love, Smara, filled with inner joy, strung his bow, its tip saluting the crest of his ear, to worship Nala and Damayanti.
पदच्छेदः
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| स्फारे | स्फार (७.१) | magnificent |
| तादृशि | तादृश् (७.१) | in such |
| वैरसेनिनगरे | वैरसेनि–नगर (७.१) | in the city of Nala |
| पुण्यैः | पुण्य (३.३) | by the merits |
| प्रजानाम् | प्रजा (६.३) | of the citizens |
| घनम् | घन (२.१) | greatly |
| विघ्नम् | विघ्न (२.१) | obstructed |
| लब्धवतः | लब्धवत् (√लभ्+क्तवतु, ६.१) | of him who had obtained |
| चिरात् | चिरात् | after a long time |
| उपनतिः | उपनति (उप√नम्+क्तिन्, १.१) | approach/entry |
| तस्मिन् | तद् (७.१) | in that |
| किल | किल | indeed |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | happened |
| कलेः | कलि (६.१) | of Kali |
| एतस्मिन् | एतद् (७.१) | in this |
| पुनः | पुनर् | again/meanwhile |
| अन्तरे | अन्तर (७.१) | interval |
| अन्तरम् | अन्तरम् | inwardly |
| इतानन्दः | इत–आनन्द (१.१) | filled with joy |
| सः | तद् (१.१) | he |
| भैमीनलावाराद्धुम् | भैमीनलौ–आराद्धुम् (आ√राध्+तुमुन्) | to worship Damayanti and Nala |
| व्यधित | व्यधित (वि√धा कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | strung |
| स्मरः | स्मर (१.१) | Smara (god of love) |
| श्रुतिशिखावन्दारुचूडम् | श्रुतिशिखा–वन्दारु–चूड (२.१) | whose tip salutes the crest of the ear |
| धनुः | धनुस् (२.१) | the bow |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्फा | रे | ता | दृ | शि | वै | र | से | नि | न | ग | रे | पु | ण्यैः | प्र | जा | नां | घ | नं |
| वि | घ्नं | ल | ब्ध | व | अ | श्चि | रा | दु | प | न | ति | स्त | स्मि | न्कि | ला | भू | त्क | लेः |
| ए | त | स्मि | न्पु | न | र | न्त | रे | ऽन्त | र | मि | ता | न | न्दः | स | भै | मी | न | ला |
| वा | रा | द्धुं | व्य | धि | त | स्म | रः | श्रु | ति | शि | खा | व | न्दा | रु | चू | डं | ध | नुः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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