अकारि नीहारनिभं प्रभञ्जना-
दधूपि यच्चागुरुसारदारुभिः
निपीय भृङ्गारकसङ्गि तत्र
तैरवर्णि वारि प्रतिवारमीदृश्-
अम्
अकारि नीहारनिभं प्रभञ्जना-
दधूपि यच्चागुरुसारदारुभिः
निपीय भृङ्गारकसङ्गि तत्र
तैरवर्णि वारि प्रतिवारमीदृश्-
अम्
दधूपि यच्चागुरुसारदारुभिः
निपीय भृङ्गारकसङ्गि तत्र
तैरवर्णि वारि प्रतिवारमीदृश्-
अम्
अन्वयः
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यत् च अगरु-सार-दारुभिः अधूपि, तत् प्रभञ्जनात् नीहार-निभम् अकारि। तत्र भृङ्गारक-सङ्गि तत् वारि निपीय तैः प्रतिवारम् ईदृशम् अवर्णि।
Summary
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The water, which was fumigated with the best aloe-wood and made mist-like by the wind, was served from a pitcher. Having drunk it, the guests repeatedly described it in the following manner.
पदच्छेदः
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| अकारि | अकारि (√कृ भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was made |
| नीहारनिभम् | नीहार–निभ (२.१) | like mist |
| प्रभञ्जनात् | प्रभञ्जन (५.१) | by the wind |
| अधूपि | अधूपि (√धूप् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was fumigated |
| यत् | यद् (१.१) | which |
| च | च | and |
| अगुरुसारदारुभिः | अगुरु–सार–दारु (३.३) | with the best pieces of aloe-wood |
| निपीय | निपीय (नि√पा+ल्यप्) | having drunk |
| भृङ्गारकसङ्गि | भृङ्गारक–सङ्गि (२.१) | contained in the pitcher |
| तत्र | तत्र | there |
| तैः | तद् (३.३) | by them |
| अवर्णि | अवर्णि (√वृ भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was described |
| वारि | वारि (१.१) | the water |
| प्रतिवारम् | प्रतिवारम् | every time |
| ईदृशम् | ईदृश (२.१) | in this manner |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | का | रि | नी | हा | र | नि | भं | प्र | भ | ञ्ज | ना |
| द | धू | पि | य | च्चा | गु | रु | सा | र | दा | रु | भिः |
| नि | पी | य | भृ | ङ्गा | र | क | स | ङ्गि | त | त्र | तै |
| र | व | र्णि | वा | रि | प्र | ति | वा | र | मी | दृ | शम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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