अनेकसंयोजनया तथाकृते-
र्निकृत्य निष्पिष्य च तादृगर्जनात् ।
अमी कृताकालिकवस्तुविस्मयं
जना बहु व्यञ्जनमभ्यवाहरन् ॥
अनेकसंयोजनया तथाकृते-
र्निकृत्य निष्पिष्य च तादृगर्जनात् ।
अमी कृताकालिकवस्तुविस्मयं
जना बहु व्यञ्जनमभ्यवाहरन् ॥
र्निकृत्य निष्पिष्य च तादृगर्जनात् ।
अमी कृताकालिकवस्तुविस्मयं
जना बहु व्यञ्जनमभ्यवाहरन् ॥
अन्वयः
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अनेक-संयोजनया, तथा-कृतेः, निकृत्य निष्पिष्य च तादृक्-अर्जनात्, अमी जनाः कृत-अकालिक-वस्तु-विस्मयम् (यथा स्यात् तथा) बहु व्यञ्जनम् अभ्यवाहरन्।
Summary
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By combining many ingredients, preparing them in a special way, and by cutting, grinding, and procuring such items, the people ate many side-dishes. This caused them to wonder at the availability of unseasonal ingredients.
पदच्छेदः
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| अनेक | अनेक | many |
| संयोजनया | संयोजना (३.१) | by the combination of |
| तथा | तथा | such |
| कृतेः | कृति (५.१) | from the preparation |
| निकृत्य | निकृत्य (नि√कृत्+ल्यप्) | having cut |
| निष्पिष्य | निष्पिष्य (निस्√पिष्+ल्यप्) | having ground |
| च | च | and |
| तादृक् | तादृश् | such |
| अर्जनात् | अर्जन (५.१) | from the procuring of |
| अमी | अदस् (१.३) | these |
| कृत | कृत (√कृ+क्त) | created |
| अकालिक | अकालिक | unseasonal |
| वस्तु | वस्तु | things |
| विस्मयम् | विस्मय (२.१) | wonder at |
| जनाः | जन (१.३) | people |
| बहु | बहु (२.१) | many |
| व्यञ्जनम् | व्यञ्जन (२.१) | side-dishes |
| अभ्यवाहरन् | अभ्यवाहरन् (अभि+अव√हृ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | ate |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ने | क | सं | यो | ज | न | या | त | था | कृ | ते |
| र्नि | कृ | त्य | नि | ष्पि | ष्य | च | ता | दृ | ग | र्ज | नात् |
| अ | मी | कृ | ता | का | लि | क | व | स्तु | वि | स्म | यं |
| ज | ना | ब | हु | व्य | ञ्ज | न | म | भ्य | वा | ह | रन् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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