अवच्छटा कापि कटाक्षणस्य सा
तथैव भङ्गी वचनस्य काचन ।
यथा युवभ्यामनुनाथने मिथः
कृशोऽपि दूतस्य न शेषितः श्रमः ॥
अवच्छटा कापि कटाक्षणस्य सा
तथैव भङ्गी वचनस्य काचन ।
यथा युवभ्यामनुनाथने मिथः
कृशोऽपि दूतस्य न शेषितः श्रमः ॥
तथैव भङ्गी वचनस्य काचन ।
यथा युवभ्यामनुनाथने मिथः
कृशोऽपि दूतस्य न शेषितः श्रमः ॥
अन्वयः
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सा कटाक्षणस्य का अपि अवच्छटा, तथा एव वचनस्य काचन भङ्गी (आसीत्), यथा युवभ्याम् मिथः अनुनाथने दूतस्य कृशः अपि श्रमः न शेषितः ।
Summary
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Such was the unique splendor of their side-glances and such was the particular style of their speech that, in their mutual wooing, not even the slightest effort was left for a messenger to perform.
पदच्छेदः
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| अवच्छटा | अवच्छटा (१.१) | a particular splendor |
| का | किम् (१.१) | some |
| अपि | अपि | indescribable |
| कटाक्षणस्य | कटाक्षण (६.१) | of the side-glance |
| सा | तद् (१.१) | that |
| तथा | तथा | so |
| एव | एव | also |
| भङ्गी | भङ्गी (१.१) | style |
| वचनस्य | वचन (६.१) | of speech |
| काचन | काचन (१.१) | a certain |
| यथा | यथा | such that |
| युवभ्याम् | युवन् (३.२) | by the two youths |
| अनुनाथने | अनुनाथन (७.१) | in wooing |
| मिथः | मिथः | mutually |
| कृशः | कृश (१.१) | slight |
| अपि | अपि | even |
| दूतस्य | दूत (६.१) | for a messenger |
| न | न | not |
| शेषितः | शेषित (√शिष्+णिच्+क्त, १.१) | was left |
| श्रमः | श्रम (१.१) | effort |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | व | च्छ | टा | का | पि | क | टा | क्ष | ण | स्य | सा |
| त | थै | व | भ | ङ्गी | व | च | न | स्य | का | च | न |
| य | था | यु | व | भ्या | म | नु | ना | थ | ने | मि | थः |
| कृ | शो | ऽपि | दू | त | स्य | न | शे | षि | तः | श्र | मः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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