विलोक्य यूना व्यजनं विधुन्वती-
मवाप्तसत्त्वेन भृशं प्रसिष्वदे ।
उदस्तकण्ठेन मृषोष्मनाटिना
विजित्य लज्जां ददृशे तदाननम् ॥
विलोक्य यूना व्यजनं विधुन्वती-
मवाप्तसत्त्वेन भृशं प्रसिष्वदे ।
उदस्तकण्ठेन मृषोष्मनाटिना
विजित्य लज्जां ददृशे तदाननम् ॥
मवाप्तसत्त्वेन भृशं प्रसिष्वदे ।
उदस्तकण्ठेन मृषोष्मनाटिना
विजित्य लज्जां ददृशे तदाननम् ॥
अन्वयः
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व्यजनं विधुन्वतीं विलोक्य अवाप्तसत्त्वेन यूना भृशं प्रसिष्वदे । (तेन) उदस्तकण्ठेन मृषोष्मनाटिना लज्जां विजित्य तदाननं ददृशे ।
Summary
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Seeing the woman fanning, the youth was overcome with passion and perspired heavily. Then, pretending to feel hot and raising his neck, he overcame his shyness and her face was seen by him.
पदच्छेदः
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| विलोक्य | विलोक्य (वि√लोक्+ल्यप्) | having seen |
| यूना | युवन् (३.१) | by the youth |
| व्यजनम् | व्यजन (२.१) | a fan |
| विधुन्वतीम् | विधुन्वत् (वि√धू+शतृ+ङीप्, २.१) | the fanning woman |
| अवाप्त-सत्त्वेन | अवाप्त–सत्त्व (३.१) | by him who was overcome with passion |
| भृशम् | भृशम् | heavily |
| प्रसिष्वदे | प्रसिष्वदे (प्र√स्विद् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | perspired |
| उदस्त-कण्ठेन | उदस्त–कण्ठ (३.१) | with raised neck |
| मृषा-उष्म-नाटिना | मृषा–उष्मन्–नाटिन् (३.१) | by him acting as if feeling false heat |
| विजित्य | विजित्य (वि√जि+ल्यप्) | having conquered |
| लज्जाम् | लज्जा (२.१) | shyness |
| ददृशे | ददृशे (√दृश् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was seen |
| तत्-आननम् | तद्–आनन (१.१) | her face |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | लो | क्य | यू | ना | व्य | ज | नं | वि | धु | न्व | ती |
| म | वा | प्त | स | त्त्वे | न | भृ | शं | प्र | सि | ष्व | दे |
| उ | द | स्त | क | ण्ठे | न | मृ | षो | ष्म | ना | टि | ना |
| वि | जि | त्य | ल | ज्जां | द | दृ | शे | त | दा | न | नम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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