नतभ्रुवः स्वच्छनखानुबिम्बन-
च्छलेन कोऽपि स्फुटकम्पकण्टकः ।
पयो ददत्याश्चरणे भृशं क्षतः
स्मरस्य बाणैः शरणे न्यविक्षत ॥
नतभ्रुवः स्वच्छनखानुबिम्बन-
च्छलेन कोऽपि स्फुटकम्पकण्टकः ।
पयो ददत्याश्चरणे भृशं क्षतः
स्मरस्य बाणैः शरणे न्यविक्षत ॥
च्छलेन कोऽपि स्फुटकम्पकण्टकः ।
पयो ददत्याश्चरणे भृशं क्षतः
स्मरस्य बाणैः शरणे न्यविक्षत ॥
अन्वयः
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स्मरस्य बाणैः भृशं क्षतः कः अपि, पयः ददत्याः नतभ्रुवः चरणे शरणे, स्वच्छनखानुबिम्बनच्छलेन स्फुटकम्पकण्टकः (सन्) न्यविक्षत ।
Summary
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Some youth, deeply wounded by Kama's arrows, took refuge at the feet of a woman with lowered brows who was offering water. Under the pretext of looking at his reflection in her clear toenails, he entered that refuge, his trembling and horripilation clearly visible.
पदच्छेदः
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| नत-भ्रुवः | नतभ्रू (६.१) | of the one with lowered brows |
| स्वच्छ-नख-अनुबिम्बन-च्छलेन | स्वच्छ–नख–अनुबिम्बन–छल (३.१) | under the pretext of seeing his reflection in her clear nails |
| कः | किम् (१.१) | some |
| अपि | अपि | one |
| स्फुट-कम्प-कण्टकः | स्फुट–कम्प–कण्टक (१.१) | with visible trembling and horripilation |
| पयः | पयस् (२.१) | water |
| ददत्याः | ददत् (√दा+शतृ+ङीप्, ६.१) | of her who was giving |
| चरणे | चरण (७.१) | at the foot |
| भृशम् | भृशम् | deeply |
| क्षतः | क्षत (√क्षन्+क्त, १.१) | wounded |
| स्मरस्य | स्मर (६.१) | of Kama |
| बाणैः | बाण (३.३) | by the arrows |
| शरणे | शरण (७.१) | in the refuge |
| न्यविक्षत | न्यविक्षत (नि√विश् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | entered |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | त | भ्रु | वः | स्व | च्छ | न | खा | नु | बि | म्ब | न |
| च्छ | ले | न | को | ऽपि | स्फु | ट | क | म्प | क | ण्ट | कः |
| प | यो | द | द | त्या | श्च | र | णे | भृ | शं | क्ष | तः |
| स्म | र | स्य | बा | णैः | श | र | णे | न्य | वि | क्ष | त |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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