परार्ध्यवेषाभरणैः पुरःसरैः
समं जिहाने निषधावनीभुजि ।
दधे सुनासीरपदाभिधेयतां
स रूढिमात्राद्यदि वृत्रशात्रवः ॥
परार्ध्यवेषाभरणैः पुरःसरैः
समं जिहाने निषधावनीभुजि ।
दधे सुनासीरपदाभिधेयतां
स रूढिमात्राद्यदि वृत्रशात्रवः ॥
समं जिहाने निषधावनीभुजि ।
दधे सुनासीरपदाभिधेयतां
स रूढिमात्राद्यदि वृत्रशात्रवः ॥
अन्वयः
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पर-अर्ध्य-वेष-आभरणैः पुरःसरैः समम् निषध-अवनी-भुजि जिहाने (सति), यदि वृत्र-शात्रवः रूढि-मात्रात् सुनासीर-पद-अभिधेयताम् दधे, सः (नलः तु वास्तव्याम् दधे) ।
Summary
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As Nala, the ruler of Nishadha, proceeded with his attendants adorned in priceless attire and ornaments, he truly bore the title of Indra. If the enemy of Vritra (the actual Indra) holds that title, it is merely by convention.
पदच्छेदः
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| परार्ध्यवेषाभरणैः | पर–अर्ध्य–वेष–आभरण (३.३) | with most valuable attire and ornaments |
| पुरःसरैः | पुरःसर (३.३) | with attendants |
| समम् | समम् | with |
| जिहाने | जिहान (√हा+शानच्, ७.१) | as he was going |
| निषधावनीभुजि | निषध–अवनी–भुज् (७.१) | as the ruler of Nishadha |
| दधे | दधे (√धा कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | bore |
| सुनासीरपदाभिधेयताम् | सुनासीर–पद–अभिधेयता (२.१) | the title of Indra |
| सः | तद् (१.१) | he |
| रूढिमात्रात् | रूढि–मात्रा (५.१) | merely from convention |
| यदि | यदि | if |
| वृत्रशात्रवः | वृत्र–शात्रव (१.१) | the enemy of Vritra |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रा | र्ध्य | वे | षा | भ | र | णैः | पु | रः | स | रैः |
| स | मं | जि | हा | ने | नि | ष | धा | व | नी | भु | जि |
| द | धे | सु | ना | सी | र | प | दा | भि | धे | य | तां |
| स | रू | ढि | मा | त्रा | द्य | दि | वृ | त्र | शा | त्र | वः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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