नलेन ताम्बूलविलासितोज्झितै-
र्मुखस्य यः पूगकणैर्भृतो न वा ।
इति व्यवेचि स्वमयूखमण्डला-
दुदञ्चदुच्चारुणचारुणश्चिरात् ॥
नलेन ताम्बूलविलासितोज्झितै-
र्मुखस्य यः पूगकणैर्भृतो न वा ।
इति व्यवेचि स्वमयूखमण्डला-
दुदञ्चदुच्चारुणचारुणश्चिरात् ॥
र्मुखस्य यः पूगकणैर्भृतो न वा ।
इति व्यवेचि स्वमयूखमण्डला-
दुदञ्चदुच्चारुणचारुणश्चिरात् ॥
अन्वयः
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यः स्व-मयूख-मण्डलात् उदञ्चत्-उच्च-अरुण-चारुणः (सन्) नलेन ताम्बूल-विलास-उज्झितैः मुखस्य पूग-कणैः भृतः न वा इति चिरात् व्यवेचि ।
Summary
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That spittoon was so beautiful with its intensely red hue rising from its own circle of rays, that only after a long time could it be discerned whether it was filled or not with the particles of areca nut spat out by Nala after enjoying betel leaf.
पदच्छेदः
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| नलेन | नल (३.१) | by Nala |
| ताम्बूलविलासितोज्झितैः | ताम्बूल–विलास–उज्झित (√उझ्झ्+क्त, ३.३) | by those spat out for the pleasure of betel |
| मुखस्य | मुख (६.१) | of the mouth |
| यः | यद् (१.१) | which (spittoon) |
| पूगकणैः | पूग–कण (३.३) | by the particles of areca nut |
| भृतः | भृत (√भृ+क्त, १.१) | filled |
| न | न | not |
| वा | वा | or |
| इति | इति | thus |
| व्यवेचि | व्यवेचि (वि√विच् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was discerned |
| स्वमयूखमण्डलात् | स्व–मयूख–मण्डल (५.१) | from its own circle of rays |
| उदञ्चदुच्चारुणचारुणः | उदञ्चत् (उद्√अञ्च्+शतृ)–उच्च–अरुण–चारुण (१.१) | beautiful with intensely rising red hue |
| चिरात् | चिरात् | after a long time |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | ले | न | ता | म्बू | ल | वि | ला | सि | तो | ज्झि | तै |
| र्मु | ख | स्य | यः | पू | ग | क | णै | र्भृ | तो | न | वा |
| इ | ति | व्य | वे | चि | स्व | म | यू | ख | म | ण्ड | ला |
| दु | द | ञ्च | दु | च्चा | रु | ण | चा | रु | ण | श्चि | रात् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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