वरस्य पाणिः परधातकौतुकी
वधूकरः पङ्कजकान्तितस्करः ।
सुराज्ञि तौ तत्र विदर्भमण्डले
ततो निबद्धौ किमु कर्कशैः कुशैः ॥
वरस्य पाणिः परधातकौतुकी
वधूकरः पङ्कजकान्तितस्करः ।
सुराज्ञि तौ तत्र विदर्भमण्डले
ततो निबद्धौ किमु कर्कशैः कुशैः ॥
वधूकरः पङ्कजकान्तितस्करः ।
सुराज्ञि तौ तत्र विदर्भमण्डले
ततो निबद्धौ किमु कर्कशैः कुशैः ॥
अन्वयः
AI
वरस्य पाणिः पर-घात-कौतुकी, वधू-करः पङ्कज-कान्ति-तस्करः । सु-राज्ञि विदर्भ-मण्डले तत्र तौ ततः कर्कशैः कुशैः किम् उ निबद्धौ?
Summary
AI
The groom's hand was eager to slay enemies, and the bride's hand was a thief of the lotus's beauty. In that good kingdom of the Vidarbha region, why then were those two tied together with harsh Kusha grass?
पदच्छेदः
AI
| वरस्य | वर (६.१) | Of the groom |
| पाणिः | पाणि (१.१) | the hand |
| परधातकौतुकी | पर–घात–कौतुकिन् (१.१) | was eager to slay enemies |
| वधूकरः | वधू–कर (१.१) | the bride's hand |
| पङ्कजकान्तितस्करः | पङ्कज–कान्ति–तस्कर (१.१) | was a thief of the lotus's beauty |
| सुराज्ञि | सुराजन् (७.१) | in the good kingdom |
| तौ | तद् (१.२) | those two |
| तत्र | तत्र | there |
| विदर्भमण्डले | विदर्भ–मण्डल (७.१) | in the Vidarbha region |
| ततः | ततस् | then |
| निबद्धौ | निबद्ध (नि√बन्ध्+क्त, १.२) | were tied |
| किमु | किम्–उ | why indeed |
| कर्कशैः | कर्कश (३.३) | with harsh |
| कुशैः | कुश (३.३) | Kusha grass |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | र | स्य | पा | णिः | प | र | धा | त | कौ | तु | की |
| व | धू | क | रः | प | ङ्क | ज | का | न्ति | त | स्क | रः |
| सु | रा | ज्ञि | तौ | त | त्र | वि | द | र्भ | म | ण्ड | ले |
| त | तो | नि | ब | द्धौ | कि | मु | क | र्क | शैः | कु | शैः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.