श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
काश्मीरैर्महिते चतुर्दशतयीं विद्यां विदद्भिर्महा-
काव्ये तद्भुवि नैषधीयचरिते सर्गोऽगमत्षोडशः ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
काश्मीरैर्महिते चतुर्दशतयीं विद्यां विदद्भिर्महा-
काव्ये तद्भुवि नैषधीयचरिते सर्गोऽगमत्षोडशः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
काश्मीरैर्महिते चतुर्दशतयीं विद्यां विदद्भिर्महा-
काव्ये तद्भुवि नैषधीयचरिते सर्गोऽगमत्षोडशः ॥
अन्वयः
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कवि-राज-राजि-मुकुट-अलंकार-हीरः श्रीहीरः च मामल्लदेवी च जित-इन्द्रिय-चयम् यम् श्रीहर्षम् सुतम् सुषुवे, चतुर्दशतयीम् विद्याम् विदद्भिः काश्मीरैः महिते, तत्-भुवि नैषधीयचरिते महाकाव्ये षोडशः सर्गः अगमत् ।
Summary
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Srihira, the diamond ornamenting the crowns of the assembly of poet-kings, and Mamalladevi begot the son Sriharsha, who had conquered his senses. In his creation, the great epic Naishadhiyacharita, which is honored by the Kashmiris who know the fourteenth lore, the sixteenth canto has now concluded.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षम् | श्रीहर्ष (२.१) | Sriharsha |
| कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः | कविराज–राजि–मुकुट–अलंकार–हीर (१.१) | the diamond ornamenting the crowns of the assembly of poet-kings |
| सुतम् | सुत (२.१) | son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Srihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√षू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | begot |
| जितेन्द्रियचयम् | जित–इन्द्रिय–चय (२.१) | one who has conquered the host of senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| काश्मीरैः | काश्मीर (३.३) | by the Kashmiris |
| महिते | महित (√मह्+क्त, ७.१) | honored |
| चतुर्दशतयीम् | चतुर्दशतयी (२.१) | the fourteenth |
| विद्याम् | विद्या (२.१) | lore |
| विदद्भिः | विदत् (√विद्+शतृ, ३.३) | by those who know |
| महाकाव्ये | महाकाव्य (७.१) | in the great epic poem |
| तद्भुवि | तद्भू (७.१) | born of him |
| नैषधीयचरिते | नैषधीयचरित (७.१) | in the Naishadhiyacharita |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| अगमत् | अगमत् (√गम् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | has concluded |
| षोडशः | षोडश (१.१) | the sixteenth |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| का | श्मी | रै | र्म | हि | ते | च | तु | र्द | श | त | यीं | वि | द्यां | वि | द | द्भि | र्म | हा |
| का | व्ये | त | द्भु | वि | नै | ष | धी | य | च | रि | ते | स | र्गो | ऽग | म | त्षो | ड | शः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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