कियदपि कथयन्स्ववृत्तजातं
श्रवणकुतूहलचञ्चलेषु तेषु ।
कियदपि निजदेशवृत्तमेभ्यः
श्रवणपथं स नयन्पुरीं विवेश ॥
कियदपि कथयन्स्ववृत्तजातं
श्रवणकुतूहलचञ्चलेषु तेषु ।
कियदपि निजदेशवृत्तमेभ्यः
श्रवणपथं स नयन्पुरीं विवेश ॥
श्रवणकुतूहलचञ्चलेषु तेषु ।
कियदपि निजदेशवृत्तमेभ्यः
श्रवणपथं स नयन्पुरीं विवेश ॥
अन्वयः
AI
सः तेषु श्रवण-कुतूहल-चञ्चलेषु (सत्सु) कियत् अपि स्व-वृत्त-जातं कथयन्, एभ्यः कियत् अपि निज-देश-वृत्तं श्रवण-पथं नयन् (सन्) पुरीं विवेश।
Summary
AI
He (Nala) entered the city while narrating some of his own adventures to the ministers, who were eager with curiosity to listen, and while also hearing from them some of the news of his own country.
पदच्छेदः
AI
| कियदपि | कियत्–अपि | some |
| कथयन् | कथयत् (√कथ्+शतृ, १.१) | narrating |
| स्ववृत्तजातम् | स्व–वृत्त–जात (२.१) | the collection of his own adventures |
| श्रवणकुतूहलचञ्चलेषु | श्रवण–कुतूहल–चञ्चल (७.३) | to those who were eager with curiosity to listen |
| तेषु | तद् (७.३) | to them |
| कियदपि | कियत्–अपि | some |
| निजदेशवृत्तम् | निज–देश–वृत्त (२.१) | the news of his own country |
| एभ्यः | इदम् (५.३) | from them |
| श्रवणपथं | श्रवण–पथ (२.१) | to the path of hearing |
| सः | तद् (१.१) | he |
| नयन् | नयत् (√नी+शतृ, १.१) | bringing |
| पुरीं | पुर (२.१) | the city |
| विवेश | विवेश (√विश् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | entered |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कि | य | द | पि | क | थ | य | न्स्व | वृ | त्त | जा | तं | |
| श्र | व | ण | कु | तू | ह | ल | च | ञ्च | ले | षु | ते | षु |
| कि | य | द | पि | नि | ज | दे | श | वृ | त्त | मे | भ्यः | |
| श्र | व | ण | प | थं | स | न | य | न्पु | रीं | वि | वे | श |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.