इति द्विकृत्वः शुचिमृष्टभोजिनां
दिनानि तेषां कतिचिन्मुदा ययुः ।
द्विरष्टसंवत्सरवारसुन्दरी-
परीष्टिभिस्तुष्टिमुपेयुषां निशि ॥
इति द्विकृत्वः शुचिमृष्टभोजिनां
दिनानि तेषां कतिचिन्मुदा ययुः ।
द्विरष्टसंवत्सरवारसुन्दरी-
परीष्टिभिस्तुष्टिमुपेयुषां निशि ॥
दिनानि तेषां कतिचिन्मुदा ययुः ।
द्विरष्टसंवत्सरवारसुन्दरी-
परीष्टिभिस्तुष्टिमुपेयुषां निशि ॥
अन्वयः
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इति शुचि-मृष्ट-भोजिनां, निशि द्वि-अष्ट-संवत्सर-वार-सुन्दरी-परीष्टिभिः तुष्टिम् उपेयुषां तेषां कतिचित् दिनानि मुदा ययुः।
Summary
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In this manner, a few days passed joyfully for them. They ate pure and delicious food twice a day and, at night, attained satisfaction through the company of beautiful sixteen-year-old courtesans.
पदच्छेदः
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| इति | इति | Thus |
| द्विकृत्वः | द्विकृत्वः | twice |
| शुचिमृष्टभोजिनां | शुचि–मृष्ट–भोजिन् (६.३) | of those who ate pure and delicious food |
| दिनानि | दिन (१.३) | days |
| तेषां | तद् (६.३) | their |
| कतिचित् | कतिचित् | some |
| मुदा | मुद् (३.१) | with joy |
| ययुः | ययुः (√या कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | passed |
| द्विरष्टसंवत्सरवारसुन्दरीपरीष्टिभिः | द्वि–अष्ट–संवत्सर–वार–सुन्दरी–परीष्टि (३.३) | by the company of beautiful sixteen-year-old courtesans |
| तुष्टिम् | तुष्टि (२.१) | satisfaction |
| उपेयुषां | उपेयिवस् (उप√इ+क्वसु, ६.३) | of those who had attained |
| निशि | निश् (७.१) | at night |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | द्वि | कृ | त्वः | शु | चि | मृ | ष्ट | भो | जि | नां |
| दि | ना | नि | ते | षां | क | ति | चि | न्मु | दा | य | युः |
| द्वि | र | ष्ट | सं | व | त्स | र | वा | र | सु | न्द | री |
| प | री | ष्टि | भि | स्तु | ष्टि | मु | पे | यु | षां | नि | शि |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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