अमीषु तथ्यानृतरत्नजातयो-
र्वराटराट्चारुनितान्तचारुणोः
स्वयं गृहाणैकमिहेत्युदीर्य
तद्द्वयं ददौ शेषजिघृक्षवे हस्-
अन्
अमीषु तथ्यानृतरत्नजातयो-
र्वराटराट्चारुनितान्तचारुणोः
स्वयं गृहाणैकमिहेत्युदीर्य
तद्द्वयं ददौ शेषजिघृक्षवे हस्-
अन्
र्वराटराट्चारुनितान्तचारुणोः
स्वयं गृहाणैकमिहेत्युदीर्य
तद्द्वयं ददौ शेषजिघृक्षवे हस्-
अन्
अन्वयः
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वराटराट् हसन्, “अमीषु तथ्य-अनृत-रत्न-जातयोः नितान्त-चारुणोः (मध्ये) इह एकं स्वयं गृहाण” इति उदीर्य, शेष-जिघृक्षवे (नलाय) तत् द्वयं ददौ।
Summary
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King Bhima, smiling, said to Nala, "Among these two extremely beautiful sets of gems, one real and one artificial, take one for yourself." After saying this, he gave both sets to Nala, who was desirous of taking the remaining one as well.
पदच्छेदः
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| अमीषु | अदस् (७.३) | among these |
| तथ्यानृतरत्नजातयोः | तथ्य–अनृत–रत्न–जात (६.२) | of the two sets of gems, real and artificial |
| वराटराट्चारुनितान्तचारुणोः | वराटराट्–चारु–नितान्त–चारुण (६.२) | of the two extremely beautiful ones, pleasing to King Bhima |
| स्वयं | स्वयम् | yourself |
| गृहाण | गृहाण (√ग्रह् कर्तरि लोट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | take |
| एकम् | एक (२.१) | one |
| इह | इह | here |
| इति | इति | thus |
| उदीर्य | उदीर्य (उत्√ईर्+ल्यप्) | having said |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| द्वयं | द्वय (२.१) | pair |
| ददौ | ददौ (√दा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | gave |
| शेषजिघृक्षवे | शेष–जिघृक्षु (४.१) | to the one desirous of taking the remaining one |
| हसन् | हसत् (√हस्+शतृ, १.१) | smiling |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | मी | षु | त | थ्या | नृ | त | र | त्न | जा | त | यो |
| र्व | रा | ट | रा | ट्चा | रु | नि | ता | न्त | चा | रु | णोः |
| स्व | यं | गृ | हा | णै | क | मि | हे | त्यु | दी | र्य | त |
| द्द्व | यं | द | दौ | शे | ष | जि | घृ | क्ष | वे | ह | सन् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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