आसुत्राममपासनान्मखभुजां भैम्यैव राजव्रजे
तादर्थ्यागमनानुरोधपरया युक्तार्जि लज्जामृजा ।
आत्मानं त्रिदशप्रसादफलताम्पत्ये विधायानया
ह्रीरोषापयशःकथानवसरः सृष्टं सुराणामपि ॥
आसुत्राममपासनान्मखभुजां भैम्यैव राजव्रजे
तादर्थ्यागमनानुरोधपरया युक्तार्जि लज्जामृजा ।
आत्मानं त्रिदशप्रसादफलताम्पत्ये विधायानया
ह्रीरोषापयशःकथानवसरः सृष्टं सुराणामपि ॥
तादर्थ्यागमनानुरोधपरया युक्तार्जि लज्जामृजा ।
आत्मानं त्रिदशप्रसादफलताम्पत्ये विधायानया
ह्रीरोषापयशःकथानवसरः सृष्टं सुराणामपि ॥
अन्वयः
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राज-व्रजे आसुत्रामम् मखभुजाम् अपासनात् तादर्थ्य-आगमन-अनुरोध-परया भैम्या एव युक्त-अर्जि लज्जा-मृजा । अनया आत्मानम् पत्ये त्रिदश-प्रसाद-फलताम् विधाय सुराणाम् अपि ह्री-रोष-अपयशः-कथा-अनवसरः सृष्टम् ।
Summary
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In the assembly of kings, Damayanti, who was mindful of the gods' request when they came as messengers, properly wiped away their shame from being rejected. By making herself the fruit of the gods' favor for her husband, she created a situation where there was no occasion for any talk of shame, anger, or disgrace for the gods.
पदच्छेदः
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| आसुत्रामम् | आसुत्रामम् | up to Indra |
| अपासनात् | अपासन (५.१) | from the rejection |
| मखभुजाम् | मखभुज् (६.३) | of the gods |
| भैम्या | भैमी (३.१) | by Damayanti |
| एव | एव | only |
| राजव्रजे | राज–व्रज (७.१) | in the assembly of kings |
| तादर्थ्यागमनानुरोधपरया | तादर्थ्य–आगमन–अनुरोध–परा (३.१) | by her who was devoted to the request of their coming for that purpose |
| युक्तार्जि | युक्त–अर्जि (१.१) | the acquisition was proper |
| लज्जामृजा | लज्जा–मृजा (१.१) | the wiping away of shame |
| आत्मानम् | आत्मन् (२.१) | herself |
| त्रिदशप्रसादफलताम् | त्रिदश–प्रसाद–फलता (२.१) | the state of being the fruit of the gods' favor |
| पत्ये | पति (४.१) | for her husband |
| विधाय | विधाय (वि√धा+ल्यप्) | having made |
| अनया | इदम् (३.१) | by her |
| ह्रीरोषापयशःकथानवसरः | ह्री–रोष–अपयशस्–कथा–अनवसर (१.१) | no occasion for the story of shame, anger, and disgrace |
| सृष्टम् | सृष्ट (√सृज्+क्त, १.१) | was created |
| सुराणाम् | सुर (६.३) | for the gods |
| अपि | अपि | even |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | सु | त्रा | म | म | पा | स | ना | न्म | ख | भु | जां | भै | म्यै | व | रा | ज | व्र | जे |
| ता | द | र्थ्या | ग | म | ना | नु | रो | ध | प | र | या | यु | क्ता | र्जि | ल | ज्जा | मृ | जा |
| आ | त्मा | नं | त्रि | द | श | प्र | सा | द | फ | ल | ता | म्प | त्ये | वि | धा | या | न | या |
| ह्री | रो | षा | प | य | शः | क | था | न | व | स | रः | सृ | ष्टं | सु | रा | णा | म | पि |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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